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जिन्दगी : ” कर्म और विचार “

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Neera Bhasinश्लोक 48 –अध्याय 2 
 भावार्थ –हे धनंजय ! तू योग में रहते हुए आसक्ति का त्याग करके तथा सिद्धि और असिद्धि में सम हो कर कर्मों को कर। यह समत्वभाव ही योग कहलाता है। 
                      प्रस्तुत श्लोक में श्री कृष्ण ने कर्म और विचारों को एक साथ रख कर अर्जुन को समझाने का प्रयास किया है। कर्म और विचारों का समन्वय योग कहलाता है अभी तक श्री कृष्ण ‘कर्म ‘ के महत्व और उसके आधार के बारे में अर्जुन को  बता रहे थे -पर अब अर्जुन का प्रश्न था की बिना फल की इच्छा के कर्म करने का क्या लाभ ?
                             लेकिन यदि हम श्री कृष्ण की  बात को गहराई से समझने का प्रयास करें तो समझ में आएगा की हमारे पास जो  ज्ञान है या जो शक्ति है उसकी एक सीमा  है। कभी कभी हम अपने किये जाने वाले कार्यों का या कर्मों के फल का हिसाब पहले से ही लगा लेते हैं ,जो सही भी हो सकता है और हमारे अनुमान के विपरीत भी हो  सकता है। विचारों में या कर्मों  में जब समत्व नहीं होता या कहें की ताल मेल नहीं बैठ पाता तब दुविधा में किये गए कार्यों का फल संतुष्टि नहीं देता। मनुष्य अपने किये गए कर्मों का फल भोगता है, यह कहना सही है –वो इसलिए की हम कर्म से पहले फल की इच्छा करते हैं। हमारे कर्मों की रूप रेखा  परिणाम के आधार पर होती है। अर्थात विफलता की कोई गुंजाईश ही नहीं होगी  – पर होती है यदा कदा ऐसी अवस्था में यदि विचारों और कर्मों का ताल मेल बिठाना हो तो ज्ञान की आवश्यकता होती है -तभी ‘योग ‘ की प्रक्रिया पूरी होगी।  हिंदी के प्रसिद्ध कवी गिरधर कविराय जी ने भी लिखा है —“बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताए। “यह कविता तो कुछ समय पूर्व ही लिखी गई है पर इससे ये तो पता चल ही जाता है की सोच विचार कर कर्म करने से बाद में पछताना नहीं पड़ता। लोभ मोह अहंकार वश किया गया काम यदि इच्छानुसार फल नहीं देता तो मनुष्य में क्रोध ,घृणा , वैर और लोभ  आदि भावनाएं घर कर जाती हैं जिसका परिणाम किसी के लिए भी सुखकारी नहीं हो सकता। आज हमारे समाज में लोभ, मोह , क्रोध और वैर आदि की भावनाओं ने मानव जाति की सोचने समझने की दिशा को एक विकृत रूप दे दिया है जिससे मानव का मानव के प्रति विशवास कम और भय बढ़ता जा रहा है। भौतिकता के अधिकाधिक संचय के कारण परिवार बिखरते जा रहें हैं ,टूटते जा रहें हैं। मानव की एक दूसरे के प्रति संवेदनाएं मानो समाप्त हो गई हैं। हर घर में ,हर नुक्क्ड़ पर ,हर गली मौहल्ले में ,हर गाँव नगर में लगता है मानो फिर से ‘महाभारत युद्ध ‘जैसे हालत पैदा हो गए हैं। ज्ञान के द्वार बंद हैं ,धर्म के नाम पर दिखावा है ,सहिषुणता के द्वार बंद हैं ,न्याय की आस टूटती जा रही है —–
अनगिनत बातें हैं ,परिस्तिथियाँ हैं जो भयंकर काल के समान मुँह खोल कर खड़ी हैं -पर विडंबना तो देखिये कहीं कोई कृष्ण नहीं है लेकिन हर आदमी अपने को कृष्ण  समझ रहा है। हर आदमी के हाथ में सुदर्शन चक्र है पर बांसुरी कहीं ढूढ़ने से भी नहीं मिल रही। आज देश का कण कण कुरुक्षेत्र बना है ,कहीं कोई अर्जुन नहीं दिखाई देता जो विपक्ष की सेना को भी अपना जान हथियार डाल  दे और कहे की ये मेरे स्वजन हैं ,
“कहाँ हो तुम कान्हा। “
                              श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाने का प्रयत्न किया की 
‘कर्म ‘ का जीवन में क्या महत्व है। कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो सारा जीवन मनुष्य करता है और निभाता है ,ये कर्म दिन प्रति दिन की जाने वाले कार्यकलापों का नियम बद्ध क्रम है।  हम इन नियमों के अंतर्गत काम करते हैं और इससे हमारे आस पास के लोगों के बीच ताल मेल बना रहता है और आत्मसंतुष्टि का भी अनुभव होता है। कई बार अपनी किसी भूल को सुधरने के लिए भी लोग कुछ कर्म करते हैं। यहाँ पर ज्ञान को देखा जा सकता है अपनी भूल को स्वीकार करना और फिर उसे सुधरने का प्रयत्न करना प्रायश्चित कहलाता है। यदि कोई कलाकार अपनी रचना का स्वरूप बनाते समय उसमे पूर्ण रूप से खो जाये और अपनी रचना को मन में संतुष्टि भावना उठे तो उसे रचना के सुंदर असुंदर होने का आभास नहीं होता। वह अपने कार्य को कर तृप्त होता है ,प्रसन्न होता है ,अपनी रचना को रचते समय वह सब कुछ भूल बैठा था -बस वो था और उसकी रचना जो क्षण क्षण आकर ले रही थी। उस समय उसके मन में ये विचार कदापि न उठ रहे थे की कोई और उसकी रचना को किस दृष्टि से देख रहा है ,लोग उसे स्वीकार करेंगे भी या नहीं। तन्मयता मनुष्य को आत्म ज्ञान वा आत्मसंतुष्टि का बोध कराती है। ऐसे समय में राग द्वेष सब मिट जाता है। श्री कृष्ण भी अर्जुन को इसी तन्मयता क आवाहन करने को कहते हैं। किसी भी परिस्तिथि में सम  भाव से किया गया कार्य ‘योग ‘माना जाता है। अर्थात स्वयं का कर्त्तव्य से एक हो जाना योग कहलाता है।  
श्लोक -49 –अध्याय 2 ,
भावार्थ –चूँकि बुद्धि योग की अपेक्षा ( अर्थात समत्वबुद्धि से युक्त हो कर किये जाने वाले कर्म की अपेक्षा ) (सकाम ) अत्यन्त निकृष्ट है ,इसलिए हे धन्जय तू (समत्व ) बुद्धि का आश्रय ग्रहण कर। फल के हेतु बनने वाले (अर्थात फल के उद्देश्य से कर्म करने वाले ) अत्यन्त दयनीय होते हैं। 
                     जब हम कोई काम करते हैं तो  उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है की हमने उस कार्य को  कितनी तन्मयता से किया ,दूसरी बात की क्या हमने उस काम को समत्व भाव से किया है या मन में राग द्वेष की भवन से प्रेरित हो कर किया है क्योंकि ऐसे कार्य ‘कर्मयोग ‘के अंतर्गत नहीं आते। विचारों का आधार बुद्धि है। किसी भी कार्य को करने से पहले हम उसे बुध्दि के हवाले कर  देते हैं अर्थात उसके लाभ हानि पर विचार करते हैं। तरह तरह की  संभावनाओं पर सफलता असफलता हेतू बुध्दि  द्वारा ही माप दंड निर्धारित करते हैं। विचारों से उत्त्पन्न तर्क – इनका समाधान बुद्धि ही करती है।  स्वामी शंकराचार्य ने ऐसे लोगों को जो कार्य करते समय अपनी बुद्धि का प्रयोग  नहीं करते उन्हें कृपण कहा है। ये लोग ऐसे धनवान होते हैं जिनके पास संपत्ति तो  है पर समय पर वे उसका सदुपयोग  करना नहीं जानते या करना नहीं चाहते!
                              धर्म का पालन करना ही कानून का पालन करना है। क्योंकि धर्म क्या है कर्त्तव्य क्या है यह समझ लेने पर ही ‘कर्म ‘और ‘कर्मफल ‘का उचित रीती से निर्वाह किया जा सकता है ,इसलिए बुद्धि का प्रयोग करना आवश्यक है। उत्तेजना में किये गए कार्य अधिकतर असफलता की ओर ले जाते हैं और इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को यही ज्ञान दे रहें हैं। इसीलिए यहां पर ‘बुद्धि योग ‘ का वर्णन किया गया है। विवेकहीन का उत्तेजना में आ कर कुछ कर बैठना अधिकतर  हानिकारक ही होता है  .आज भी हम अस्थिर विवेक के कारण अपने  दिन प्रति दिन के व्यव्हार में कुछ ना कुछ हानि उठाते रहते हैं  और फिर पछताने लगते हैं। कुरुक्षेत्र में इस समय यदि परिस्तिथि को बुद्धि बल से संभाला न गया तो पांडवों की हार निश्चित थी। जिसके मस्तिष्क में हार जीत का दवंद चलता रहता है उसकी बुध्दि कभी स्थिर नहीं हो सकती। इस लिए श्री  कहा था “कर्म कर ,फल की चिंता न कर। “यदि अर्जुन के हृदय में मोह और धर्म का दवंद चलता रहा तो संभव था की मोह विचारों पर हावी हो जाता , क्योंकि कर्त्तव्य और धर्म से ‘मोह ‘ कहीं अधिक सक्षम है। यह मानव स्वभाव को अपना दास बना लेता है और कोई भी इसके आगे अपनी सोचने समझने की शक्ति खो बैठता है। अर्जुन भी यही सोच कर शिथिल हो गया था की उसके समक्ष खड़े शत्रु उसके शत्रु नहीं थे बल्कि उसके  स्वजन थे –और यही सोच कर वह  विवेकहीन हो गया , तब उसे ना धर्म का ध्यान रहा न कर्म का ,न कर्त्तव्य का ,न जन हित  का और न ही राष्ट्र हित का। समाज में रहने वाले मनुष्य को जन हित में अपने कर्मों का निर्वाह करना अनिवार्य है ‘हाँ एक सन्यासी के लिए ऐसा कोई बंधन नहीं है।