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जिन्दगी :” योद्धा का कर्तव्य “

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Neera Bhasinश्लोक 40 —  अध्याय 2 
भावार्थ –इस ( कर्मयोग ) में आरम्भ ( किये हुए कर्म ) का नाश नहीं है  और प्रत्यवाय (अर्थात कर्म ना करने से होने वाला विपरीत फलरूप दोष ) भी नहीं है। इस (कर्मयोग रूप )धर्म का थोड़ा भी आचरण (जन्म मरण के )महान भय से रक्षा करता है। सभी के जीवन में एक बार नहीं कई कई बार परीक्षा की घड़ियाँ आती रहती हैं।  ऐसी परिस्तिथि में मनुष्य के गुण प्रधान होते हैं की वह डट कर हालत से मुकाबला करे -ऐसे में  मन ,बुद्धि ,चित्त ,कृत व्यवहार ,समय और काल एवं परिस्तिथियों को ध्यान में रखना भी  बहुत आवश्यक है ,कुछ भी अनदेखा करना हानि कारक हो सकता है। आजकल सड़क के दोनों तरफ कुछ बोर्ड दिखाई देते हैं जिन पर वाहन चालक के लिए कुछ निर्देश लिखे होते हैं। कई स्थानों पर लिखा होता है 
“नजर हटी -दुर्घटना घटी ” कुछ ऐसी सावधानी का सामना हर उस व्यक्ति को करना होता है जिसके सामने विकट  परिस्तिथियाँ आ खड़ी  होती हैं। ऐसे में जो निर्णय लिए जाते हैं ,आवश्यक नहीं की वो व्यक्ति विशेष की स्वार्थ पूर्ति के लिए हों ,निजी स्वार्थ के लिए गए निर्णय कठिन नहीं होते और दुविधा में भी नहीं डालते ,पर जहाँ बात  परिवार ,समाज और राष्ट्र के लोगों  की आती है मन में दुविधाओं का सैलाब उमड़ने लगता है और निर्णय लेना कठिन होता जाता है। करूँ या  न करूँ की परिस्तिथियाँ बन जाती हैं। ऐसे में किसी का भी निरुत्साहित हो जाना कोई बड़ी बात नहीं। ऐसे में कर्म  फल की चिंता होना भी स्वाभाविक है। आज के इस तकनिकी युग में भी लोग क्या कहेंगे यह चिंता सताने लगती है ,लोग सोचने लगते हैं कहीं हम समाज की सोच या नियमों के विरुद्ध तो नहीं जा रहे। 
 परन्तु कुरुक्षेत्र के बीचों बीच खड़े अर्जुन को श्री कृष्ण यही बताने का प्रयास कर रहे हैं वो इस परिस्तिथि को समझने 
का प्रयास करे। यहाँ एक बात ध्यान देना योग्य है -वह है श्री कृष्ण का अपना व्यक्तित्व ,जो जन साधारण की  सोच और समझ से कहीं ऊपर है। कृष्ण से  श्री कृष्ण  वे स्वयं अपने ज्ञान ध्यान और कर्मों के कारण 
बने। तत्कालीन शासक उनको सदा अग्रणीय और पुज्य्नीय मानते थे और आज हम उन्हें ईश्वर  का अवतार मानते हैं। यह बात गीता में उनके द्वारा दिए गए उपदेशों से स्पष्ट हो जाती है। जो ज्ञान श्री कृष्ण ने दिया वो उस युग में भी सार्थक था और आज भी उतना ही सार्थक है तथा भविष्य में भी रहेगा। 
उपरोक्त पंक्तियों में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा की वो उनके उपदेश ध्यान से सुने क्योंकि वे अर्जुन को कर्म फल के भय  से मुक्त होने का होने का उपाय बताने जा रहे हैं। जिससे मोक्ष प्राप्ति की राह पर चलना आसान हो जायेगा। अब ऐसे में कौन है जो कृष्ण की बात पर ध्यान नहीं देगा ,आकर्षित नहीं होगा। 
‘महाभारत ‘का युद्ध वैदिक काल के हजारों वर्षों के बाद हुआ ऐसा कहा जाता है। उस युग में जब वेदों की रचना की गई तो उसमें  ‘कर्म ‘करने का वर्णन किया गया था ,पर वे कर्म पूजा अर्चना ,यज्ञ आदि के विधि विधान का वर्णन हैं ,जिसमें अधिकतर सिमित कार्य क्षेत्र देखा जा सकता है। क्योंकि वेदों में पूरा ध्यान विधि विधान पर केंद्रित था  इसलिए यह भी माना जाता था की यदि ‘कर्म कांड ‘के समय कोई चूक हो गई या फिर कोई विघ्न -अपशकुन 
आ पड़ा तो किये जा रहे विधान का फल विपरीत हो सकता है। यह भय उस युग में भी था और आज भी है। पूजा अर्चना ,व्रत -उपवास यज्ञ आदि सब मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ही किये जाते थे और आज भी किये जाते हैं। यहाँ तक की मृत्यु के उपरान्त किये जाने वाले तरपन और हवन आदि भी इस लिए किये जाते हैं की दिंवगत मनुष्य की आत्मा किसी कारण उन्हें दुःख न दे -सुख में बाधा न बने। परन्तु कुरुक्षेत्र में खड़े श्री कृष्ण अर्जुन को जिस ‘कर्म ‘को करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं वह सर्वथा भिन्न है —यहाँ पर ‘कर्म ‘फल की आशा रख कर नहीं किया जा रहा ,यहाँ ‘कर्म ‘एक योद्धा का कर्तव्य है। युद्ध के पहले कैसे कहा जा सकता है की जीत किसकी होगी या पराजय किसकी ,किसको वीरगति प्राप्त होगी और किसका जीवन अभी बाकी  है। क्योंकि युद्ध के यही तो परिणाम होते हैं। हमें समझना होगा की यह कर्म कांड नहीं 
कर्मयोग है जो मानव जाति  ध्यान में रख कर करना होगा। इसमें अपने मन में उठ रहे द्व्न्द के लिए कोई स्थान ही नहीं। कर्तव्य की राह कठिन है पर आत्मविश्वास से अधिक नहीं। 
  श्लोक –41 ,अद्ध्याय 2 
भावार्थ –हे कुरुवंशी !इस (कर्म योग )में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है ,किन्तु अनिश्चयी मनुष्यों की बुद्धियाँ अनेक भेदों  वाली और
अनंत प्रकार की होती हैं। 
                          ज्ञान और कर्म और फिर इनके चलते धर्म ,जब हम धर्म की बात करते हैं तो उसके  साथ हजारों वर्षों का इतिहास जुड़ा होता 
है। मान्यताओं से भी  संबंध होता है और इन परम्पराओं का हम पीढ़ी  
दर पीढ़ी पालन करते जाते हैं और अपने आगे आने वाली पीढ़ी को भी उस निरंतरता की थाती थमा देते हैं। शायद यही वजह है की भारतीय धर्म का इतिहास कहीं भी किसी तिथि काल या व्यक्ति से बंधा नहीं है ‘
अधिकतर लोग युगों  से बिना कोई प्रश्न उठाये उन परम्पराओं को 
निभाते चले आ रहे हैं। अब जब लोगों ने अपने जीवन क्षेत्र में विज्ञान और तकनीक का विकास कर लिया है तो किसी किसी के मन में जिज्ञासा जागृत हो जाना स्वाभाविक है। कुछ  परम्पराएं ऐसी हैं जिन पर  आध्यात्मिक शोध बहुत पहले ही सिद्ध  किये जा चुके थे ,पर अब लोग वैज्ञानिक ढँग से भी उनके कारणों का पता लगा कर उन्हें स्वीकार 
करने लगे हैं। आज की युवा पीढ़ी की कुछ ऐसी सोच उभर कर सामने आ रही है। 
                   अब हमारे समक्ष एक प्रश्न है की ‘कर्म ‘कैसे होने चाहिए। 
उसके कारण क्या होंगे उससे किस फल की प्राप्ति होगी आदि आदि। साधारण रूप से दिन प्रति दिन होने वाले या या फिर किसी लाभ के लिए किये गए प्रयत्नों को ‘कर्म ‘ की परिभाषा के अंतर्गत नहीं रख सकते। ये सब भौतिक सुखों की प्राप्ति का साधन मात्र हैं। समय की गति के साथ इनकी आवश्यकता ,मात्रा और लाभ  हानि के स्वरुप बदलते रहते हैं। कारण की हमारी निजी आवश्कताएँ ,रूचि -अरुचि सब परिवर्तनशील हैं। तो यह भी निश्चित हुआ की कर्मो का स्वरुप भी आवश्यकता अनुसार बदलेगा .हम पूजा -पाठ ,कथा – वार्ता ,व्रत -उपवास आदि जो भी करते हैं वो सब उन सुखों के लिए होता है जो क्षणभंगुर हैं। एक वास्तु या लक्ष्य 
की प्राप्ति होते ही और अधिक इच्छाएं जाग उठती हैं ,फिर और -और उसके बाद फिर और ,तदनुसार हमारे कर्मों में भी परिवर्तन होता रहता है। इससे मनुष्य भौतिक रूप से तो संपन्न  हो सकता है परन्तु उसे शाश्वत  ज्ञान की प्राप्ति नहीं कहा जा सकता। 
  यह चर्चा आगे भी जारी रहेगी। अभी के लिए धन्यवाद