सुदर्शन चक्रधर महाराष्ट्र के मराठी दैनिक देशोंनती व हिंदी दैनिक राष्ट्र प्रकाश के यूनिट हेड, कार्यकारी सम्पादक हैं. हाल ही में उन्हें जीवन साधना गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अपने बेबाक लेखन से सत्ता व विपक्ष के गलियारों में हलचल मचा देने वाले सुदर्शन चक्रधर अपनी सटीक बात के लिए पहचाने जाते हैं. उनके फेसबुक पेज से साभार !
जिसका डर था, वही हो रहा है. देश की फिजा बदल रही है. देश बंट रहा है, दो ध्रुवों में! दो विपरीत विचारधाराओं में! मसला न्यायिक हो, आर्थिक हो, या सामाजिक,… दो पक्ष हर मामले में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिख रहे हैं. एक-दूसरे की बखिया उधेड़ रहे हैं! …तो क्या यह देश के बदलाव का संक्रमण काल है? इस सप्ताह में आए तीन न्यायिक फैसलों के बाद हमारे नेताओं की फिसलती जुबान और उनकी गतिविधियों ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि देश में ध्रुवीकरण की राजनीति पूरी तरह हावी हो चुकी है. ऐसे हालातों में लग रहा है कि हम पुराने हिंदुस्तान या भारत में नहीं रह रहे हैं, बल्कि अब नए इंडिया में जा रहे हैं. यह ऐसा ‘न्यू इंडिया’ है, जिसमें तू हिंदू है, मैं मुसलमान हूं! ये दलित है, वह इसाई है! अमुक जैन है, तमुक सिख है! अपने-अपने धर्म व संप्रदाय में बांटा जा रहा है हमें! संभवत: इसीलिए बहुत दिनों से यह नारा नहीं सुनाई दिया,- “गर्व से कहो हम भारतीय हैं!”_
_इस सप्ताह तीन बड़े अदालती फैसले आए. हैदराबाद के मक्का मस्जिद ब्लास्ट केस में आरएसएस के पूर्व प्रचारक स्वामी असीमानंद समेत पांच आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया. सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ कांड की सुनवाई करने वाले विशेष जज बीएच लोया की मृत्यु को प्राकृतिक बताकर सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी जांच से इनकार कर दिया. वहीं, गुजरात के नरोदा-पाटिया दंगा मामले के आरोपी पूर्व मंत्री माया कोडनानी को भी हाईकोर्ट ने बरी कर दिया. इन तीनों फैसलों को बीजेपी या हिंदुत्ववादी संगठनों के फेवर में जाता देख, कांग्रेस व अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों को मिर्ची लग गई. असीमानंद की रिहाई से कांग्रेस की ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी अदालत में दम तोड़ गई. ‘हिंदू आतंकवाद’ का नाम लेकर 2009-10 में कांग्रेस ने जो नया हथियार भाजपा पर चलाया था, वह अब उसी के गले पड़ गया. इससे कांग्रेस बौखला गई. बाकी के ‘लग्गू-भग्गू’ दल भी उसका साथ दे कर कहने लगे कि ‘सत्तारूढ़ दल (भाजपा) न्यायपालिका पर दबाव बनाकर अपने पक्ष में फैसले करवा रही है!’_
_जज लोया मृत्यू प्रकरण की दोबारा जांच वाली कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला की याचिका खारिज होने पर कांग्रेस इतनी तिलमिला गई कि उसने भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने का नोटिस भी दे डाला! यह जानते हुए भी कि संसद में उसकी हार होगी, जानबूझकर कांग्रेस ने यह सियासी दांव खेला है. इसमें 20-22 विपक्षी दलों में से कुल सात दल कांग्रेस का साथ देने तैयार हुए. खुद कांग्रेस में ही इस मुद्दे पर मतभेद हैं. क्योंकि आजाद भारत के इतिहास में पहली बार किसी प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ ‘महाभियोग प्रस्ताव’ लाया जा रहा है. दरअसल, कांग्रेस को डर है कि अगर दीपक मिश्रा पद पर बने रहे, तो अयोध्या विवाद का फैसला भी हिंदुओं के पक्ष में ही आएगा! वहीं ओवैसी की पार्टी के प्रवक्ता कह रहे हैं कि अगर हिंदुत्ववादी आरोपी ऐसे ही छूटते रहे, तो डर है कि कहीं दो-चार साल बाद कठुआ और उन्नाव रेप कांड के दरिंदे भी बाइज्जत बरी न हो जाएं! मतलब यह कि इनका न्यायपालिका पर अब भरोसा ही नहीं रहा!_
_ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन दिनों देश में न्याय’ नहीं हो रहा है? क्या सब पक्षपात ही हो रहा है? हमें लगता है कि यह सारा खेल-प्रपंच सिर्फ और सिर्फ ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए ही खेला-रचा जा रहा है. देश में वोटों का, वोट-बैंक का और जनता के दिलोदिमाग का… जितना ध्रुवीकरण होगा, इन राजदलों को उतना ज्यादा सियासी फायदा आगामी चुनाव में होगा. इनको देश की और जनता की मूलभूत समस्याओं (सड़क-पानी-बिजली-महंगाई-बेरो जगारी आदि) से कोई मतलब नहीं है. अगर ऐसा नहीं है, तो हर न्यायिक फैसले पर कांग्रेस परेशान क्यों है? अगर बीजेपी से संबंधित कोई पकड़ा जाता है या उन्हें सजा होती है, तब तो कांग्रेसियों और ओवैसियों को देश में न्याय होता दिखता है, मगर यदि वे बरी हो जाते हैं, तो उन्हें देश में न्याय नाम की कोई चीज ही नहीं दिखती! सब अन्याय होता ही दिखता है. आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों? टूजी घोटाले के तमाम आरोपियों को इसी सुप्रीम कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया था, तब तो कांग्रेसियों ने इसे न्याय की जीत बताया था, मगर अब इनके ‘पिछवाड़े में खुजली’ होना समझ से परे है!_
_सच तो यही है कि जिनका न्यायपालिका पर भरोसा नहीं है, सरकार और संसद पर भरोसा नहीं है, वही लोग लोकतंत्र बचाने और उस पर खतरा होने की बात फैला रहे हैं. क्या महाभियोग की सियासत लोकतंत्र के लिए घातक नहीं है? न्यायपालिका का सम्मान ही देश का सम्मान होता है. उसे दबाव में या रिमोट कंट्रोल से नहीं चलाया जा सकता. अगर न्याय की छवि और भरोसा टूट गया तो ‘सच्चा न्याय’ भी हमेशा झूठा ही लगेगा! इसमें दुखद तथ्य यह भी है कि हमारा ‘चौथा स्तंभ’ (मीडिया) भी दो ध्रुवों में बंटता दिख रहा है. ये चैनल उसका, वो चैनल इसका! ये अखबार उसका, वो अख़बार इसका! लानत है हम पर कि… हम सब आपस में ही बंट रहे हैं! मगर इस बंटवारे में भारत हार रहा है! लोकतंत्र हार रहा है! जय हिंद।_
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