

विवादों में घिरे रहे जस्टिस(रिटायर्ड) जे.चेलमेश्वर के तेवर जस के तस हैं। उधर, उनसे कुपित लोगों की संख्या कम नहीं है। वह आलोचनाओं से विचलित नहीं दिखते। जस्टिस चेलमेश्वर कहते हैं, गांधीजी का सम्मान कौन नहीं करता था? कुछ विषयों पर बापू से असहमत लोग भी उनके प्रति गहरा आदर भाव रखते थे। बार काउंसिल आफ इंडिया ने हाल ही में उन पर पद की गरिमा गिराने का आरोप लगाया है। जवाब में वह कटाक्ष करते हैं, कुछ लोग मेरा नाम तक सही ढंग से नहीं बोल पाते लेकिन इनमें से कुछ भविष्य में न्यायाधीश बन सकते हैं। चेलमेश्वर इस बात से इंकार करते हैं कि एक प्रेस इंटरव्यू में उन्होंने बेंच फिक्सिंग जैसे शब्दों का उपयोग किया है। उनका कहना यह है कि इस शब्द का उपयोग उनका इंटरव्यू ले रहे व्यक्ति ने किया था, मैंंने तो उस संदर्भ में सिर्फ चिंता व्यक्त की थी।
जस्टिस चेलमेश्वर के बयानों से व्यवस्था के प्रति उनके अंदर के आवेश और असहमति का अनुमान लगाया जा सकता है। उनके द्वारा एक प्रेस इंटरव्यू के दौरान कथित रूप से की गई टिप्पणी की बार काउंसिल आफ इंडिया ने आलोचना की है। जस्टिस चेलमेश्वर के रिटायरमेंट के तीन दिन बाद आया बार काउंसिल का बयान अखबारों की सुर्खियों में रहा। बार काउंसिल के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कहा है कि जस्टिस चेलमेश्वर ने कुछ मुद्दों पर खुद ही सुनवाई कर सुप्रीम कोर्ट में गलत परम्परा शुरू कर दी। उन्होंने बेंच फिक्सिंग जैसा शब्द उछाला। सवाल यह है कि जस्टिस चेलमेश्वर ने अपने कार्यकाल के दौरान कथित बेंच फिक्सिंग पर आपत्ति क्यों नहीं उठाई? जस्टिस चेलमेश्वर ने प्रेस इंटरव्यू मेें कुछ विवादित और अप्रासंगिक बातें कहीं हंै। उनकी ऐसी टिप्पणियां बहिष्कार करने योग्य हैं। बार काउंसिल की प्रतिक्रिया काफी सख्त है। यह पहला मौका होगा कि जब बार काउंसिल ने किसी पूर्व न्यायाधीश की किसी टिप्पणी पर इतना सख्त रुख दिखाया। कह सकते हैं कि जिस तरह से जस्टिस चेलमेश्वर का व्यवहार न्यायिक इतिहास में अभूतपूर्व रहा, उसी तरह बार काउंसिल की प्रतिक्रिया भी अपनी तरह की अभूतपूर्व है। ऐसा करते समय बार काउंसिल ने न्यायपालिका की गरिमा और सम्मान को सुनिश्चित करने विशेष ध्यान रखा गया। याद करें कि 12 जनवरी 2018 की प्रेस कांफे्रस ने किस तरह भूचाल सा ला दिया था। न्यायपालिका और विधि पेश से जुड़े लोगों की राय साफतौर बंटी दिखाई दी। पलड़ा इस दृष्टिकोण के पक्ष का भारी रहा कि सुप्रीम कोर्ट एडमिनिस्ट्रेन से जुड़े विषय को अंदर ही निबटाया जाना चाहिए था। अंदरूनी विवादों को सार्वजनिक किया जाना सही कदम नहीं माना जा सकता। गौर करें, बार काउंसिल की प्रतिक्रिया के लिए अवसर और समय का ध्यान रखा गया। जस्टिस चेलमेश्वर के रिटायर होने के बाद ही उनके बयान की खुली आलोचना की गई। जहां तक बेंच फिक्सिंग शब्द के प्रयोग की बात है तो जस्टिस चेलमेश्वर के इस स्पष्टीकरण पर अविश्वास करने का कोई कारण नजर नहीं आता। हमारे यहां मीडिया के ऐसे खुरापाती कम नहीं हैं जिन्हें अपने शब्द दूसरे के मुंह में ठूंसने में पारंगत माना जाता है। जस्टिस चेलमेश्वर से इतनी अपेक्षा की जा सकती है कि यदि उन्होंने बेंच फिक्सिंग जैसे शब्द का उपयोग नहीं किया था तो उसे उनके मत्थे मढऩे वाले पत्रकार से जवाब तलब कर लेते। 12 जनवरी की प्रेस कांफें्रस के बाद से इस शब्द को चलन में लाने की अप्रत्यक्ष कोशिशें की जाती रहीं हंै।
जस्टिस चेलमेश्वर को किसी प्रकार का अफसोस नहीं है। आपके अफसोस करने या नहीं करने से अब क्या होने वाला है। जो नुकसान होना था वह तो हुआ ही। इस धारणा को खारिज करना कठिन होगा कि प्रेस काफें्रस आयोजित करने का आइडिया जस्टिस चेलमेश्वर के दिमाग की ही उपज था। न्यायिक और विधि क्षेत्र से जुड़े अनेक विद्वानों का मानना है कि 12 जनवरी की प्रेस कांफें्रस से न्यायपालिका और लोकतंत्र का भला हुआ हो या नहीं परंतु हानि अवश्य हुई है। न्यायपालिका के प्रति सम्मान भाव, आस्था और विश्वास रखने वाले आमजन को गहरी ठेस पहुंची है। राजनीति और मीडिया के जो लोग न्यायपालिका के विषय में जुबान चलाने से बचते थे, उन्हें बतियाने का मौका मिल गया। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के विरूद्ध कांग्रेस द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश क्या उसी प्रेस कांफें्रस के बाद तेज नहीं हो गई थी? यहां बहुमत वाले दूसरे पक्ष की ओर देखना होगा जिसने अंदर के मतभेद बाहर लाए जाने को नापसंद किया है। हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश टी.एस.ठाकुर ने चार न्यायाधीशों द्वारा प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के विरूद्ध प्रेस कांफें्रस सम्बोधित किए जाने की साफ शब्दों में आलोचना की है। जस्टिस ठाकुर ने कहा कि संस्थागत समस्याओं के समाधान के लिए उन्हें बाहर जाने की जरूरत नहीं थी। हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर.एस.सोढ़ी कह चुके हैं कि चारों को यदि कोई समस्या रही है तो वे इस्तीफा दे सकते थे। उन्होंने ऐसा नहीं किया। न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन किया गया है। ध्यान रहे कि आप अवमानना की शक्ति के साथ कांच के घर के अंदर बैठे हैं। उनका अभिप्राय यह रहा होगा कि वे पहले इस्तीफा देते फिर कुछ बोलते। कुछ प्रख्यात कानूनविदों ने इसे महाभियोग का विषय माना था।
धारा के विपरीत जाने के औचित्य पर अनेक प्रश्र खड़े किए जा सकते हैं किन्तु जस्टिस चेलमेश्वर जैसा दुस्साहस कितने लोग कर पाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने एक बार जस्टिस चेलमेश्वर को अदालत में सन्यासी निरूपित किया था। एक सन्यासी ही धारा के विपरीत तैरने का साहस कर सकता है। सही या गलत से हट कर सोचें तो विचारों के मामले में जस्टिस चेलमेश्वर काफी दृढ़ देख गए हैं। वह नेशनल ज्युडिशियल अपाइंटमेंट कमीशन (एनजेएसी)बिल मामले में पीठ के अन्य सदस्यों के विचारों से विपरीत इसके समर्थन में खुलकर सामने आए थे। फ्रीडम आफ स्पीच पर उनका फैसला काफी चर्चित रहा। इसे दूरगामी प्रभाव वाला माना जाता है। न्यायाधीश के रूप में उनकी विद्वत्ता असंदिग्ध है। उनका आचरण और व्यवहार हट कर दिखता रहा। उन्होंने हमेशा वही कहा और किया जो उन्हें सही लगा। यही कारण है कि 12 जनवरी को प्रधान न्यायाधीश के विरूद्ध पे्रस कांफें्रस का रास्ता चुनने को वह गलत नहीं मान रहे हैं। प्रेस कांफें्रस के बाद कम्युनिस्ट नेता डी.राजा से अपने निवास पर मिलने को भी वह अनुचित नहीं मानते हैं। हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि राजा से उनकी मुलाकात से एक अलग ही संदेश देश भर में फैल गया। इस मुलाकात ने प्रेस कांफें्रस के धमाके की घण्टा भर में हवा निकाल दी थी। प्रेस कांफें्रस आयोजन के उद्देश्य पर पलीता लग गया। तत्काल यह संदेश फैल गया कि राजनीतिक ताकतें सक्रिय हैं। बहरहाल, पिछले छह-सात माह के घटनाक्रम ने इस जिज्ञासा का जन्म दिया कि क्या जस्टिस चेलमेश्वर वाकई अदालत में सन्यासी रहे हैं? जवाब हां में है तब इस सन्यास-भाव की वजह क्या थी? इसे प्रकृति प्रदत्त जीवन जीने का तरीका नहीं मान सकते। परिस्थितिवश सन्यास मार्ग पर चल निकलना अवश्य कहा जा सकता है। हाल ही में एक मीडिया रिपोर्ट पढऩे का अवसर मिला जिसमें बताया गया था कि कैसे समय ने जस्टिस चेलमेश्वर को न्यायपालिका के शीर्ष पद से वंचित कर दिया। वरिष्ठता क्रम के मामले में वह भाग्यशाली नहीं रहे। पिछले 20-22 सालों पर नजर डालें। जस्टिस चेलमेश्वर 23 जून 1997 को हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने थे जबकि जस्टिस दीपक मिश्रा 1996 और जस्टिस खेहर 1999 हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने। जस्टिस चेलमेश्वर 3 मई 2007 को गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बन गए थे। जस्टिस मिश्रा और जस्टिस खेहर क्रमश: 23 दिसम्बर 2009 और 29 नवम्बर 2009 हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। इस स्थिति तक जस्टिस चेलमेश्वर वरिष्ठ थे लेकिन इसके बाद भाग्यचक्र बदल गया। 13 सितम्बर 2011 को जस्टिस खेहर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बन गए। एक माह बाद जस्टिस मिश्रा और जस्टिस चेलमेश्वर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने। इससे वरिष्ठता क्रम में जस्टिस चेलमेश्वर पिछड़ गए। ऐसा कहा जाता है कि यदि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पद सम्भालने से वरिष्ठता क्रम तय करने की व्यवस्था होती तो जस्टिस चेलमेश्वर 4 जनवरी 2017 को जस्टिस टी.एस.ठाकुर के रिटायर होने पर भारत के प्रधान न्यायाधीश बन जाते। कह सकते हैं कि भाग्य और नियुक्ति व्यवस्था दोनों ने जस्टिस चेलमेश्वर का साथ नहीं दिया। जिज्ञासा का समाधान स्वत: सामने दिखाई देता है। कहीं जस्टिस चेलमेश्वर के इस कथित सन्यास भाव के पीछे भाग्य द्वारा किए गए छल से उपजी निराशा की भूमिका तो नहीं रही है।
अनिल बिहारी श्रीवास्तव
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