• ABOUT US
  • DISCLAIMER
  • PRIVACY POLICY
  • TERMS & CONDITION
  • CONTACT US
  • ADVERTISE WITH US
  • तेज़ समाचार मराठी
Tezsamachar
  • Home
  • देश
  • दुनिया
  • प्रदेश
  • खेल
  • मनोरंजन
  • लाईफस्टाईल
  • विविधा
No Result
View All Result
  • Home
  • देश
  • दुनिया
  • प्रदेश
  • खेल
  • मनोरंजन
  • लाईफस्टाईल
  • विविधा
No Result
View All Result
Tezsamachar
No Result
View All Result

इतिहास के पन्नों से : वे पंद्रह दिन (10 अगस्त 1947)

Tez Samachar by Tez Samachar
August 10, 2018
in Featured
0
इतिहास के पन्नों से : वे पंद्रह दिन (10 अगस्त 1947)

दस अगस्त…. रविवार की एक अलसाई हुई सुबह. सरदार वल्लभभाई पटेल के बंगले अर्थात १, औरंगजेब रोड पर काफी हलचल शुरू हो गयी है. सरदार पटेल वैसे भी सुबह जल्दी सोकर उठते हैं. उनका दिन जल्दी प्रारम्भ होता है. बंगले में रहने वाले सभी लोगों को इसकी आदत हो गयी है. इसलिए जब सुबह सवेरे जोधपुर के महाराज की आलीशान चमकदार गाड़ी पोर्च में आकर खड़ी हुई, तब वहां के कर्मचारियों के लिए यह एक साधारण सी बात थी.

जोधपुर नरेश, हनुमंत सिंह…. ये कोई मामूली व्यक्ति नहीं थे. राजपूताना की सबसे बड़ी रियासत. जिसका इतिहास बहुत पीछे, यानी सन १२५० तक जाता है. पच्चीस लाख जनसंख्या वाली यह विशाल रियासत, छत्तीस हजार स्क्वेयर मील में फ़ैली हुई है. पिछले कुछ दिनों से मोहम्मद अली जिन्ना इस रियासत को पाकिस्तान में विलीन कराने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं. वी.के. मेनन ने यह सारी जानकारी सरदार वल्लभभाई पटेल को दी थी. इसीलिए सरदार जी ने जोधपुर नरेश हनुमंत सिंह को अपने घर आमंत्रित किया हुआ हैं.
सरदार पटेल, हनुमंत सिंह को साथ लेकर अपने विशाल और शानदार दीवानखाने में आए. आरंभिक औपचारिक बातचीत के बाद सरदार पटेल सीधे मूल विषय पर आ गए, “मैंने सुना है कि लॉर्ड माउंटबेटन से आपकी भेंट हुई थी, क्या चर्चा हुई?”
हनुमंत सिंह : जी सरदार साहब. भेंट तो हुई, लेकिन कोई ख़ास चर्चा नहीं हुई है.
सरदार पटेल : परन्तु मैंने तो सुना है कि आपकी भेंट जिन्ना से भी हुई है और आपने यह निर्णय लिया है कि आपकी रियासत स्वतन्त्र रहेगी?
हनुमंत सिंह : (झेंपते हुए) हां, आपने एकदम सही सुना है.
सरदार पटेल : यदि आपको स्वतन्त्र रहना है, तो रह सकते हैं. परन्तु आपके इस निर्णय के बाद यदि जोधपुर रियासत में कोई विद्रोह हुआ तो भारत सरकार से आप किसी सहायता की उम्मीद ना रखें.
हनुमंत सिंह : परन्तु जिन्ना साहब ने हमें बहुत सी सुविधाएं और आश्वासन दिए हैं. उन्होंने यह भी कहा है कि वे जोधपुर को कराची से रेलमार्ग द्वारा जोड़ देंगे. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो हमारी रियासत का व्यापार ठप्प पड़ जाएगा.
सरदार पटेल : हम आपके जोधपुर को कच्छ से जोड़ देंगे. आपकी रियासत के व्यापार पर कतई कोई फर्क नहीं पड़ेगा. और हनुमंत जी, एक बात और है कि आपके पिताजी यानी उमेश सिंह जी, मेरे अच्छे मित्रों में से एक थे. उन्होंने मुझे आपकी देखभाल का जिम्मा सौंपा हुआ है. यदि आप सीधे रास्ते पर नहीं चलते हैं, तो आपको अनुशासन में लाने के लिए मुझे आपके पिता की भूमिका निभानी पड़ेगी.
हनुमंत सिंह : सरदार पटेल साहब,आपको ऐसा करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी. मैं कल ही जोधपुर जाकर भारत देश के साथ विलीनीकरण के करार पर अपने हस्ताक्षर करता हूं.
संभवतः रविवार होने के कारण कलकत्ता के सोडेपुर आश्रम में गांधीजी की प्रातः प्रार्थना में अच्छी खासी भीड़ इकठ्ठा थी. गांधीजी ने सदा की भांति अपनी शैली में प्रार्थना और सूत कताई की और अब वे लोगों को संबोधित करने के तैयार हैं. गांधीजी अक्सर बैठे-बैठे ही संवाद स्थापित करते हैं. उन्होंने बोलना शुरू किया –“ मैं नोआखाली जाने के लिए निकलने ही वाला था, परन्तु मेरा वह पूर्व-नियोजित दौरा मैंने कुछ दिनों के लिए आगे टाल दिया है. क्योंकि कलकत्ता के अनेक मुस्लिम मित्रों ने मुझसे ऐसा करने की बिनती की है. मुझे ऐसा लग रहा है कि यदि मैं नोआखाली गया, और यहां कलकत्ता में कोई अप्रिय घटना हुई तो समझिये कि मेरा जीवन जीने का प्रयोजन ही नष्ट हो जाएगा.”
धीमे स्वरों में वे आगे बोलते रहे…. “मुझे यह सुनकर बेहद दुःख हुआ है कि कलकत्ता के अनेक भागों में मुस्लिम बन्धु जा नहीं सकते हैं और कई भागों में हिन्दू लोग नहीं जा सकते हैं. मैं स्वयं इन सभी क्षेत्रों में जाकर देखने वाला हूँ कि क्या स्थिति है. इस शहर में केवल २3% मुसलमान हैं. ये २3% लोग किसी का क्या बिगाड़ सकते हैं? मैंने तो ऐसा भी सुना है कि आगामी कांग्रेस शासन की आड़ लेकर कुछ हिन्दू पुलिसवाले मुसलमानों को परेशान कर रहे हैं. यदि पुलिस बल में भी ऐसी ही जातीय भावना घर कर गयी है, तो भारत का भविष्य निश्चित ही अंधकारमय हो जाएगा…” प्रार्थना के लिए एकत्रित लोगों में हिन्दुओं की संख्या ही अधिक हैं. उन्हें गांधीजी द्वारा दिया गया भाषण बिलकुल पसंद नहीं आया हैं. यदि केवल २3% मुसलमान पिछले वर्ष ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दिन हजारों हिन्दुओं का खून बहा सकते हैं, तो यदि वे बहुमत में आ जाएंगे, तो हमारा क्या होगा? यही प्रश्न वे सभी लोग आपस में एक-दूसरे से पूछ रहे हैं.
प्रार्थना पूरी होने के बाद गांधीजी ने उनका नियमित हल्का नाश्ता, यानी एक कप बकरी का दूध, थोड़ा सा सूखा मेवा और खजूर ग्रहण किया और वे अंदर के कमरे में आए. यहां वे काँग्रेस सरकार के मंत्रियों के साथ चर्चा करने वाले हैं. धीरे-धीरे सारे मंत्री वहां इकठ्ठा होने लगे. अगले पन्द्रह मिनट में ही भावी मुख्यमंत्री प्रफुल्लचंद्र घोष और उनके आवश्यक सहयोगी भी आ गए. गांधीजी अपनी हमेशा वाली, धीमी बोलने वाली, शैली में इन सभी मंत्रियों को समझाने लगे. उन्होंने कहा, “सुहरावर्दी के शासनकाल में भले ही हिंदुओं पर थोड़े-बहुत अत्याचार हुए हों, हो सकता है कि कुछ मुस्लिम पुलिसवालों ने भी हिंदुओं से अच्छा बर्ताव नहीं किया हो. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम भी प्रतिशोधात्मक कार्यवाही करने लग जाएं. कलकत्ता का एक-एक मुसलमान सुरक्षित रहना चाहिए, इसकी चिंता आप सभी को करनी हैं.”
उधर दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित हिन्दू महासभा के भवन में चल रही ‘अखिल भारतीय हिन्दू संसद’ का आज दूसरा दिन हैं. अखण्ड हिन्दुस्तान से इस परिषद् के लिए आए हुए सभी प्रतिनिधियों के मन में विभाजन के प्रति गहरा क्रोध हैं, आक्रोश हैं. उनके मन में विस्थापित होने वाले एवं मारे जा रहे हिंदुओं-सिखों के लिए वेदना हैं. आज इस सभा में प्रस्ताव का दिन हैं. बहुत से वक्ताओं ने अपनी बात रखी. बंगाल से आए हुए न्यायमूर्ति निर्मलचन्द्र चटर्जी बहुत ही बढ़िया बोले. उन्होंने कहा कि “तीन जून को ब्रिटिश सरकार द्वारा दिया गया विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार करके काँग्रेस ने न केवल बहुत बड़ी गलती की है वरन करोड़ों भारतीयों की पीठ में छुरा भी घोंपा है. भारत का विभाजन स्वीकार करने का अर्थ यह है कि काँग्रेस ने मुस्लिम लीग की गुंडागर्दी के सामने पराजय स्वीकार कर ली है.”
इस परिषद् में सुबह के सत्र में सबसे अंत में बोलने वाले थे वीर सावरकर. उन्होंने अपने शानदार वक्तृत्व एवं तर्कशुद्ध मुद्दों के साथ सभी प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध कर दिया. सावरकर ने कहा कि, “अब सरकारों से कोई निवेदन अथवा अनुरोध नहीं करना हैं. अब हमें सीधे प्रत्यक्ष रूप में कृति करनी चाहिए. सभी दलों के हिन्दू, अपने हिन्दुस्तान को अखंड बनाने के लिए अपने-अपने काम से लग जाएं. नेहरू ने जो डरपोक तर्क दिया है कि ‘खूनखराबा टालने के लिए हमने पाकिस्तान के निर्माण की मान्यता दी है’, वह केवल धोखेबाजी है. क्योंकि विभाजन मंजूर होने के बाद भी मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का रक्तपात बन्द तो हुआ ही नहीं, वरन अब देश के और भी टुकड़े करने की मांग वे कर रहे हैं. यदि समय रहते इन बातों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया, तो इस देश में चौदह पाकिस्तान बनने का खतरा है. इस कारण केवल रक्तपात से भयभीत न होते हुए हमें ‘जैसे को तैसा’ वाला जवाब देना चाहिए. सभी हिंदुओं को पार्टी भेद भुलाकर संगठित होते हुए, सामर्थ्यवान बनना चाहिए, ताकि देश का विभाजन नष्ट किया जा सके.”
इसी सभा में सर्वानुमति से यह मांगे की गई कि ‘सभी हिंदुओं को पार्टी भेद से ऊपर उठते हुए अखंड भारत निर्माण हेतु संगठित होना चाहिए. भगवा ध्वज, ही राष्ट्रध्वज होना चाहिए. हिन्दी राष्ट्रभाषा होनी चाहिए तथा भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए. देश में जल्दी से जल्दी आम चुनाव भी करवाए जाएं.’
आकाश में बादल छाए हुए हैं, और हल्की बारिश के कारण गीला-गीला सा हो गया हैं, कराची शहर. सिंध प्रोविंशियल लेजिस्लेटिव असेम्बली के उस हॉल में पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली संक्षिप्त बैठक शुरू हुई हैं. वैसे तो आज कोई खास कामकाज नहीं हैं. मुख्य कार्य जो भी होना हैं, वह तो कल ही होगा. क्योंकि कल ‘कायदे-आज़म’ जिन्ना, स्वतः असेम्बली को संबोधित करने वाले हैं.
ठीक ग्यारह बजे असेंब्ली का कामकाज आरम्भ हुआ. कुल ७२ सदस्यों में से ५२ सदस्य उपस्थित थे. पश्चिम पंजाब के दो सिख सदस्यों ने इस असेम्बली का बहिष्कार किया हुआ हैं, तो ज़ाहिर है कि वे भी उपस्थित नहीं हैं. पहली पंक्ति में बैठे, पाकिस्तान के गवर्नर जनरल घोषित किए गए, बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना, जब अपनी सीट से उठकर मंच पर जाने लगे तो सभी सदस्यों ने सम्मानपूर्वक, तालियों की गडगडाहट और मेजे थपथपाकर उनका स्वागत किया. जिन्ना ने पाकिस्तान की संसदीय कार्यवाही के रजिस्टर पर सबसे पहले हस्ताक्षर किए. पाकिस्तान की संविधान सभा के अध्यक्ष पद हेतु उन्होंने बंगाल के जोगेन्द्रनाथ मण्डल का नाम प्रस्तावित किया और वह तत्काल मंजूर भी हो गया.
अखंड भारत की अंतरिम सरकार में क़ानून मंत्री रहे, दलितों के नेता जोगेंद्रनाथ मण्डल ही पाकिस्तान की पहली Constituent Assembly के पहले अध्यक्ष बने. जोगेंद्रनाथ मंडल १९४० में काँग्रेस से निष्कासित किए जाने के बाद मुस्लिम लीग में शामिल हुए थे. बंगाल के सुहरावर्दी मंत्रिमंडल में वे मंत्री भी थे. १९४६ में हिंदुओं के खिलाफ बंगाल के कुख्यात ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की भीषण हिंसा के समय मंडल साहब पूरे बंगाल में प्रवास करते हुए ‘दलितों को मुसलमानों के खिलाफ नहीं होने के लिए’ मनाते रहे. मुस्लिम लीग और जिन्ना ने जोगेंद्रनाथ मण्डल के इस कार्य की ‘सराहना’की, और उन्हें पुरस्कार स्वरूप असेम्बली का अध्यक्ष बनाया. असेम्बली की आज की कार्यवाही केवल एक घंटा दस मिनट चली. बाहर कोई खास भीड़ नहीं थी और ना ही लोगों में कोई उत्साह दिखाई दिया.
रविवार दोपहर का समय. पुरानी दिल्ली के मुस्लिम लीग कार्यालय के बाहर अनेक मुसलमान क्रोध में हैं और आपस में विवाद कर रहे हैं. दिल्ली के मुस्लिम व्यापारियों का आरोप है कि ‘मुस्लिम लीग के नेता हमें मुसीबत में छोड़कर पाकिस्तान भाग रहे हैं’. प्रतिदिन निकलने वाली ‘पाकिस्तान स्पेशल ट्रेन’ में मुस्लिम लीग का कोई न कोई नेता पाकिस्तान जा रहा है. इन्हीं नेताओं के विरोध में आक्रोशित मुस्लिम व्यापारियों ने दरियागंज बाज़ार बन्द का आव्हान किया हुआ है. दिल्ली के मुसलमानों को ऐसा लग रहा है कि वे नेतृत्वविहीन हो गए हैं.
दिल्ली की म्युनिसिपल कमेटी ने बैठकों एवं छोटे-मोटे कार्यक्रमों के लिए एक सुन्दर हॉल का निर्माण किया है. दोपहर के भोजन के बाद नेहरू ने इस नवनिर्मित हॉल का निरीक्षण किया.
शाम को १७, यॉर्क रोड के अपने विशाल बंगले में नेहरू अपने सेक्रेटरी को एक पत्र का डिक्टेशन दे रहे हैं….

प्रिय लॉर्ड माउंटबेटन,
९ अगस्त को आपके द्वारा लिखे गए उस पत्र हेतु आभार, जिसमें आपने अगले वर्ष से पन्द्रह अगस्त के दिन शासकीय इमारतों पर ‘यूनियन जैक’ फहराने के सम्बन्ध में लिखा है. मुझे आपको यह बताते हुए हर्ष होता है कि आपके सुझाव के अनुसार अगले वर्ष से हम १५ अगस्त को तिरंगे के साथ यूनियन जैक भी फहराएंगे.
आपका विश्वासपात्र
जवाहरलाल नेहरू

यानी जिस ध्वज को खत्म करने, नीचे गिराने के लिए अनेक क्रांतिकारियों, अनेक सत्याग्रहियों ने गोलियां खाईं, अत्याचार सहे… वही यूनियन जैक स्वतंत्रता दिवस के साथ ही और १२ प्रमुख दिनों में भारत की सभी शासकीय इमारतों पर फहरने वाला हैं..!
दोपहर की परछाईयां अब धीरे-धीरे लंबी होती जा रही हैं. लाहौर के ‘बारूदखाना’ नामक इलाके में मुसलमानों की गंभीर हलचल, अत्यधिक जोश और उत्साह से जारी हैं. यह वही इलाका है, जहां हिंदुओं और सिखों की दिनदहाड़े भी जाने की हिम्मत नहीं होती. इस इलाके में मियाँ परिवार का एकछत्र साम्राज्य हैं. लाहौर के प्रथम नागरिक (मेयर) का यह क्षेत्र हैं. इस क्षेत्र में नियमित रूप से एक भटियारखाना चलता रहता है. हिन्दू-सिख परिवारों को पाकिस्तान से भगाने और उनकी लड़कियां उठाने वाले मुस्लिम गुण्डों के लिए यहां दिन भर खाने-पीने की व्यवस्था रहती है. आज ‘मियाँ की हवेली’ में षड्यंत्र रचा जा रहा हैं, १४ अगस्त के बारे में. एकमत से यह तय किया होता हैं की १४ अगस्त के बाद लाहौर में एक भी हिन्दू-सिख को नहीं रहने दिया जाएगा. यह योजना, इसी सन्दर्भ में बन रही हैं.
अब केवल अगले चार दिन ही अखंड रहने वाले इस भारत में, शाम की विभिन्न छटाएं देखने को मिल रही हैं. जहां सुदूर पूर्व अर्थात असम और कलकत्ता में दीपक और बिजली जलाने का समय हो चुका हैं, वहीं पूर्व में पेशावर और माउंटगोमरी में अभी भी धूप अपने हाथ-पैर लंबे कर, अलसाई हुई मुद्रा में शाम ढलने का इंतज़ार कर रही हैं. इसी पृष्ठभूमि में, अलवर, हापुड, लायलपुर, अमृतसर जैसे शहरों से भयंकर दंगों की ख़बरें लगातार आती जा रही हैं. अनेक हिंदुओं के मकानों पर आग लगाए हुए कपड़े के गोले फेंके जा रहे हैं. अनेक हिंदू बस्तियों में व्यापारियों की दुकाने लूटकर उन्हें खाली कर दिया गया हैं.
लाहौर स्थित जेल रोड पर रहने वाले वीरभान. असिस्टेंट डायरेक्टर ऑफ इंडस्ट्रीज़ जैसे बड़े पद पर आसीन, एकदम जिंदादिल, परोपकारी व्यक्ति. लाहौर शहर की अस्थिर और खतरनाक स्थिति को देखते हुए, उन्होंने रविवार की छुट्टी का फायदा उठाते हुए, यह शहर छोड़ने का निर्णय लिया. इस काम के लिए उन्होंने दो ट्रक बुक किए. अनेक वर्षों तक उनकी सेवा करने वाला और उन्हें भरोसेमंद लगने वाला उनका ड्रायवर मुसलमान ही हैं. वीरभान ने उसी को ट्रक में भरने के लिए कुछ कुली लाने भेजा. उनका वह कथित भरोसेमंद मुस्लिम ड्रायवर, लाहौर के मोझंग इलाके के कुछ मुस्लिम गुण्डों को कुली के रूप में ले आया. शाम तक उन सभी ने वीरभान का सारा सामान दोनों ट्रकों में भर लिया. जब वीरभान महोदय कुलियों को पैसा देने पहुंचे, तो उन सभी ने आपस में मिलकर वीरभान पर आक्रमण कर दिया. चाकुओं के लगातार कई वार किए. अपने पति को तडपते हुए रक्त में डूबा देखकर उनकी पत्नी को चक्कर आ गए. गुण्डों ने उन्हें भी ट्रक में डाला और रात के अंधेरे में दोनों ही ट्रक उनके इच्छित स्थान की तरफ रवाना हो गए. सौभाग्य केवल इतना ही रहा कि वीरभान की दोनों किशोरवयीन लड़कियां, यह घटना देखकर पिछले दरवाजे से निकल भागीं और सीधे हिन्दू बहुल मोहल्ले ‘किशन नगर’ में ही रुकीं… इसीलिए वे बच गईं.
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी की, पंजाब की राजधानी में, एक भरीपूरी बस्ती के बीचोंबीच, दस अगस्त की शाम को हत्या और लूटपाट कर दी गई, लेकिन कोई हलचल नहीं हुई.
जिस समय लाहौर में वीरभान रक्त के तालाब में डूबे तड़प रहे थे, और वे मुस्लिम गुण्डे उनकी पत्नी के साथ ही उनकी पूरी संपत्ति लूट रहे थे….. ठीक उसी समय आठ सौ मील दूर कराची में पाकिस्तान के आगामी वज़ीर-ए-आज़म, लियाकत अली का वक्तव्य अखबारों के कार्यालयों में पहुंच चुका था. लियाकत अली ने अपने प्रेस नोट में लिखा था कि, “हम बारंबार आश्वासन देते हैं कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों को न केवल संरक्षण दिया जाएगा, बल्कि उन्हें कायदे-क़ानून के अनुसार पूरे अधिकार भी प्रदान किए जाएंगे. हिन्दू यहां पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे. लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक हिन्दू लोग इस प्रकार से नहीं सोच रहे हैं.”
लियाकत अली ने आगे लिखा कि, “भारत के विविध प्रान्तों से जो ख़बरें आ रही हैं… खासकर पूर्वी पंजाब, पश्चिम बंगाल और संयुक्त प्रान्त से, उसके अनुसार हमारे मुस्लिम बंधुओं पर बहुसंख्यक हिन्दू जबरदस्त अत्याचार कर रहे हैं. काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष स्वयं ही सिंध प्रांत के अपने दौरे में यहां के हिंदुओं को हमारे खिलाफ भड़का रहे हैं. विभिन्न प्रेस रिपोर्ट्स के जरिये मेरी जानकारी में आया है कि कृपलानी ने यह धमकी दी है कि सिंध प्रांत के हिन्दू क़ानून अपने हाथों में लेंगे, और जो घटनाएं बिहार में हुई हैं, वैसी ही सिंध में भी दोहराई जाएंगी….!”
लाहौर का संघ कार्यालय…. वैसे तो छोटा सा ही हैं, परन्तु आज कार्यकर्ताओं / स्वयंसेवकों की भीड़ से भरा हुआ हैं. रविवार दस अगस्त की रात को दस बजे भी इस कार्यालय में खासी चहल-पहल हैं. स्वयंसेवकों के चेहरे से साफ़ दिख रहाहैं कि वे तनावग्रस्त हैं. लाहौर के हिन्दू और सिखों को सुरक्षित रूप से भारत की तरफ वाले पंजाब कैसे पहुंचाया जाए, इसकी चिंता सभी के मन में हैं. कार्यालय के बाहर संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार की अर्ध-प्रतिमा लगी हुई हैं. पास के मकान से आने वाले बल्ब की पीली रोशनी मूर्ति पर पड़ने से वह चेहरा चमक रहा हैं. डॉक्टर हेडगेवार की देश में यह पहली मूर्ति हैं. लेकिन यह मूर्ति गवाह हैं, कि पंजाब प्रांत के स्वयंसेवकों ने पिछले दिनों में हिंदु-सिखों को बचाने के लिए किस प्रकार अदम्य साहस, धैर्य, पुरुषार्थ एवं जिजीविषा का परिचय दिया हैं….!

Tags: 1947 partition storiesBhimrao Ambedkarcauses and effects of partition of indiaDelhieffects of the partition of indiaindia pakistan partition truthJawaharlal NeharuJinnaLahormahatma gandhiMahatma Gandipartition of india summarypartition of india violencepolitical impact of partition of indiaPt. Jawaharlal Neharureasons for partition of indiaSaradar VallaBhBhai PatelVeer Savarkarwhy did the partition of india happen
Previous Post

शिरपुर: 76 वर्षीय वृद्ध महिला पर धोखाधड़ी का आरोप, प्रशासन संदेह के घेरे में

Next Post

दीदी की दादागिरी क्यों करें बर्दाश्त

Next Post
दीदी की दादागिरी क्यों करें बर्दाश्त

दीदी की दादागिरी क्यों करें बर्दाश्त

  • Disclaimer
  • Privacy
  • Advertisement
  • Contact Us

© 2025 JNews - Premium WordPress news & magazine theme by Jegtheme.

No Result
View All Result
  • Home
  • देश
  • दुनिया
  • प्रदेश
  • खेल
  • मनोरंजन
  • लाईफस्टाईल
  • विविधा

© 2025 JNews - Premium WordPress news & magazine theme by Jegtheme.