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वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी का जीवन साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की अद्वितीय मिसाल – अमित शाह

Vishal Chaddha by Vishal Chaddha
March 20, 2026
in Featured, देश, प्रदेश, महिला जगत
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वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी का जीवन साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की अद्वितीय मिसाल – अमित शाह

नई दिल्ली ( प्रतिनिधि ) – केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी के बलिदान दिवस पर उन्हें अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की. सोशल मीडिया प्लेटफोर्म X पर किए गए एक पोस्ट में  गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, “वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी जी का जीवन साहस, त्याग व राष्ट्रभक्ति की अद्वितीय मिसाल है. 1857 के संग्राम में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया और आत्मसमर्पण के बजाय वीरगति को चुना. उनका बलिदान राष्ट्र के प्रति समर्पण व स्वाभिमान का अमर संदेश है. उनकी जयंती पर सादर नमन.”

कौन थी रानी अवंतीबाई लोधी

रानी अवंतीबाई लोधी भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 की एक अद्वितीय राष्ट्रीय शहीद और वीरांगना थीं, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध खड़े होकर नारी वीरता की अमर मिसाल कायम की. रानी अवंतीबाई लोधी का जन्म 16 अगस्त 1831 को मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम मनकेहणी (मनकड़ी) में हुआ था. उनके पिता राव जुझार सिंह एक प्रतिष्ठित जमींदार थे और माँ कृष्णा बाई की वह लाड़ली पुत्री थीं. बाल्यकाल से ही उनमें वीरता, साहस और पराक्रम की भावना भरी हुई थी; बचपन में ही उन्होंने तलवारबाजी और घुड़सवारी में प्रशिक्षण लेकर अपने भीतर योद्धा‑लक्षण विकसित किए.

रानी अवंतीबाई का विवाह रामगढ़ के युवराज विक्रमादित्य सिंह से हुआ, जो राजा लक्ष्मण सिंह के सुपुत्र थे. राजा लक्ष्मण सिंह के निधन के बाद विक्रमादित्य सिंह रामगढ़ के राजा बने, लेकिन उनकी कमजोर सेहत के कारण राज्य‑प्रशासन की जिम्मेदारी व्यावहारिक रूप से रानी अवंतीबाई ने संभाली.

अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध बगावत

रानी के दो पुत्र अमान सिंह और शेरसिंह थे, जो भविष्य में राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी होने थे. किन्तु गवर्नर‑जनरल लॉर्ड डलहौजी की ‘संप्रभुता हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) ने न केवल बड़े‑बड़े राज्यों बल्कि छोटे‑छोटे रियासतों को भी झकझोर दिया. रामगढ़ रियासत भी इस नीति का शिकार हुई. अस्वस्थ विक्रमादित्य सिंह को “अयोग्य” और उनके दोनों पुत्रों को नाबालिग घोषित कर कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत रामगढ़ राज्य को ब्रिटिश अधिकार में ले लिया गया और वहाँ अंग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिए गए.

रानी अवंतीबाई ने इस कार्य को अन्यायपूर्ण माना और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अंग्रेज नियुक्त अधिकारियों को रामगढ़ से बाहर निकालकर राज्य का शासन स्वयं अपने हाथ में ले लिया. रानी ने किसानों को अंग्रेजों के कर‑निर्देशों का पालन न करने का आदेश दिया और कर‑वसूली के नाम पर हो रही अत्याचार‑योजनाओं के खिलाफ जनता को जागरूक किया. इस निर्णय से उनकी लोकप्रियता ग्रामीण जनता के बीच तेजी से बढ़ी और वे न केवल रामगढ़, बल्कि पूरे आसपास क्षेत्र में एक विश्वसनीय और न्यायप्रिय शासिका के रूप में प्रसिद्ध हुईं.

पहली महिला शहीद

कई इतिहासकार मानते हैं कि रानी अवंतीबाई लोधी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में प्रथम महिला आत्म‑बलिदानी थीं, जिन्होंने वीरगति लेकर राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई महिला आयाम दिया. मध्य प्रदेश में रानी अवंतीबाई लोधी विश्वविद्यालय (राबल कॉलेज) जैसे शैक्षणिक संस्थानों का नाम उनके सम्मान में रखा गया है, जो शिक्षा और आदिवासी/पिछड़े वर्गों के उत्थान के संकेतार्थ है.

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में रानी अवंतीबाई ने छोटे‑छोटे राज्यों और जमींदारों को एकजुट करने का ऐतिहासिक कार्य किया. उन्होंने सहयोगियों के साथ गुजरी, रामनगर, बिछिया जैसे क्षेत्रों से अंग्रेजी प्रशासन का सफाया कर दिया और यहाँ तक कि मंडला पर आक्रमण करने का निर्णय भी लिया. रानी ने राजाओं, जमींदारों और मालगुजारों को एक पत्र और दो काली चूड़ियों की पुड़िया भेजी. पत्र में उनका संदेश था. “अँग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो, या चूड़ियाँ पहनकर घर बैठो.” रानी अवंतीबाई की इस अपील ने न केवल रक्षक वर्ग को जोड़ा, बल्कि स्वतंत्रता‑सेना के रूप में एक व्यापक जन‑आन्दोलन की नींव रखी.

23 नवंबर 1857 को खैरी (घुघरी) के प्रसिद्ध युद्ध में रानी की संगठित सेना ने मंडला के डिप्टी कमिश्नर वाडिंग्टन की अंग्रेज सेना को पराजित कर दिया और अपने नेतृत्व‑कौशल तथा युद्ध‑कौशल का अद्भुत परिचय दिया. ब्रिटिश सेना की तुलना में आकस्मिक और सीमित शक्ति के बावजूद रानी की सेना ने युद्ध‑भूमि को बदल दिया.

शहादत और अंतिम बयान

अंग्रेज पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए लगातार हमले करते रहे, लेकिन रानी का दृढ़ मनोबल और शौर्य कम नहीं हुआ. 20 मार्च 1858 को देवहारीगढ़ (देवहारगढ़) के युद्ध‑क्षेत्र में अंग्रेजी सेना ने उन पर घातक आक्रमण किया. जब रानी ने देखा कि वह घिरी हुई हैं और अंग्रेजों के हाथों बंदी बनने से बचना संभव नहीं, तो उन्होंने अपनी तलवार से ही आत्मबलिदान कर दिया. इस तरह उन्होंने ‘स्वाभिमान, साहस, वीरता, स्वतंत्रता और मातृभूमि‑प्रेम’ के संदेश को युद्धभूमि पर ही अमर कर दिया.

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