अटल जी ने चुटकी लेते हुए कहा -”आदर्श पत्नी की खोज में”
नई दिल्ली ( तेजसमाचार संवाददाता ) – अटलजी के प्रेरक जीवन के अविस्मरणीय प्रसंगों को विभिन्न पुस्तकों और स्रोतों से अटलनामा के जरिए एक मीडिया मित्र ने सुन्दर संकलित किया है. हिन्दुस्तान को परमाणु संपन्न कर विश्व पटल पर स्थान दिलाने वाले पूर्व प्रधानमन्त्री, राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक, पत्रकार, कवि, ओजस्वी वक्ता, करोड़ों भारतवासियों के आदर्श अटल बिहारी वाजपेयी का स्मरण करते हुए तेजसमाचार.कॉम की श्रध्दा सुमनों के साथ प्रस्तुति :-भाग 01
01-
एक महिला पत्रकार ने जब अटल जी से पूछा कि आप ने शादी क्यों नहीं की तो अटल जी ने ऐसा जवाब दिया कि महिला पत्रकार फिर कुछ और न पूछ सकी.
महिला पत्रकार ने अटल जी से उनके कुंवारे रहने के रहस्य के बारे में पूछा कि आप अभी तक अविवाहित क्यों हैं?
अटल जी ने चुटकी लेते हुए कहा – ”आदर्श पत्नी की खोज में”
महिला पत्रकार ने चौंक कर पूछा- ”तो क्या ऐसी कोई नहीं मिली”
अटल जी ने उदास स्वर में कहा – ”मिली तो थी…पर उसे भी आदर्श पति की तलाश थी”
ऐसे अद्भुत हाजिरजवाब हमारे अटल जी.
02-
23 जून 1980 को संजय गांधी की दिल्ली में एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई. जनवरी 1980 में ही चुनाव हो गए थे और कांग्रेस फिर से सत्ता में आ चुकी थी वो भी पूर्ण बहुमत के साथ. ऐसे में सत्ता वापसी के कुछ ही महीनों के भीतर संजय गांधी की असमय मौत ने कांग्रेस सहित पूरे देश को हिला कर रख दिया…
उनके अंतिम संस्कार में देशभर के बड़े नेता-अभिनेता जुडे. अटल जी भी पहुंचे थे. पत्रकार वार्ता में जब उनसे संजय गांधी की मौत पर प्रतिक्रिया मांगी गई….तब अटल जी ने कहा – ”ज्वलनम् श्रेय: न च धूमायितं चिरम्”
जिसका मतलब होता है कि अधिक समय तक सुलगते रहने की अपेक्षा एक क्षण का प्रकाश देकर बुझ जाना ज्यादा अच्छा है.
इसी तरह….संजय गांधी की स्मृति में आयोजित एक शोकसभा में गम में डूबे कांग्रेसियों और संजय गांधी के प्रशंसकों से अटल जी ने कहा कि – ” भारत माता की गोद सूनी हुई है..कोख सूनी नही हुई है”
03-
घटना जनवरी 2001 की है…तब अटल जी प्रधानमंत्री थे. दिल्ली के विज्ञान भवन में देश भर की 5 चुनिंदा महिलाओं को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए स्त्री शक्ति अवार्ड दिया जा रहा था. ये पुरस्कार पाने वाली 5 महिलाओं में से चिन्नापिल्लई भी थी.चिन्नापिल्लई तमिलनाडू में मदुरै के पास पुल्लिसेरी गांव में रहती थी. चिन्नापिलाई ने गरीब और अनपढ़ किसानों के सशक्तिकरण में अहम भूमिका निभाई थी. मंच पर पहुँचते ही चिन्नापिल्लई अटल जी को देखकर भावुक हो गईं और तुरंत उनके पैर छूने को झुकी. लेकिन इसके बाद जो हुआ उससे पूरे विज्ञान भवन में पहले तो दो मिनट तक सन्नाटा छा गया फिर ताबड़तोड़ तालियाँ बजीं. वहां मौजूद लगभग हर कोई भावुक हो गया. हुआ ये कि जैसे ही अटल जी के पैर छूने के लिए चिन्नापिल्लई झुकी..अटल जी ने उन्हें रोका..और खुद झुककर उनके पैर छू लिए. जी हाँ…अटल जी ने खुद हवाई चप्पल पहनी हुई उस महिला के पैर छुए और उनसे आशीर्वाद मांगा .
04-
जब पंडित नेहरू की तस्वीर मंत्रालय में लगवाई.
1977 की बात है. जनता पार्टी ने इंदिरा गांधी की निरंकुश सरकार को बुरी तरह हरा कर केंद्र में सरकार बनाई. उस सरकार में अटल जी की पार्टी जनसंघ भी शामिल थी. मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बनें तो अटल जी भारत के विदेश मंत्री बने. विदेश मंत्री बनने के बाद जब पहली बार अटल जी अपने ऑफिस में गए तो घुसते ही वो रूक गए…उन्हें कुछ अजीब सा लगा. वो समझ गए कि क्या अजीब हुआ है ? उन्होंने फौरन विदेश मंत्रालय (M.E.A.) के अधिकारियों से पूछा कि – ‘’यहाँ सामने की दीवार में जो खाली जगह दिख रही है वहाँ पहले जवाहर लाल नेहरू जी की तस्वीर थी,वो अब नहीं है…कहां गई वो तस्वीर’’ ?
(चूंकि अटल जी सन 1957 से ही सांसद थे इसलिए मंत्रालय भवनों में तो उनके चक्कर लगते ही रहते थे. उन्हें पता होता था कहां क्या है.)
जवाब में अधिकारियों ने बताया कि इमरजेंसी लगाने के बाद मंत्रालय के लोगों में भी कांग्रेस को लेकर बड़ी नफरत है और इसलिए क्षुब्ध होकर किसी ने बड़ी सावधानीपूर्वक वो तस्वीर हटी दी.
इतना सुनना था कि अटल जी थोड़े से कड़क लहजे में बोले कि ‘’वो तस्वीर जहाँ भी है..उसको फौरन ले आइए और यहाँ लगाइए…नहीं मिलती है तो नेहरू जी की कोई दूसरी तस्वीर लगाइए….मगर लगाइए जरूर.‘’
थोड़ा खोजने पर वो तस्वीर मिल गई और उसे वहीं लगा दिया गया जहाँ से उसे उतारा गया था.
मित्रों….इस प्रसंग का ज़िक्र महान इतिहासकार और क्रिकेटविद् श्री रामचंद गुहा ने अपने ब्लाग पर लिखा है. उन्होंने उस वरिष्ठ M.E.A. के अधिकारी का भी जिक्र किया है जो इस प्रसंग का गवाह था.
ऐसे हैं हमारे अटल जी.
मित्रों…इमरजेंसी के बाद इंदिरा जी के प्रति नफरत/कड़वाहट स्वाभाविक थी…फिर क्या देवालय और क्या मंत्रालय…कड़वाहट हर जगह थी. चूँकि नेहरू सीधे सीधे इंदिरा जी से जुड़े थे इसलिए कांग्रेस के कुशासन का ‘बदला’ किसी ने उस तस्वीर को हटाकर अपना ले लिया….लेकिन अटल जी ने इस अनुचित समझा. उस अटल ने जो इमरजेंसी के दौरान महीनों जेल में रहे…अटल जी का तो कुपित होना जायज भी था पर अटल जी तो धर्मराज समान थे. उनको उचित अनुचित के बीच की बहुत बारीक लाइन की भी बडी समझ थी. नेहरू जी के आलोचक होने के वाबजूद वो कई मसलों पर उनका बड़ा सम्मान करते थे. अटल जी खुद कहते थे कि संसद का माहौल तभी बनता था जब नेहरू जी मौजूद रहते थे. खैर…. सन 1977 में जब पूरा देश कांग्रेस की ‘सत्ता-मृत्यु’ पर जश्न मना रहा था तो उस जश्न में भी अटल जी के पैर जमीन पर बने रहे…उसूलों पर खड़े रहे.
लेकिन जब उन्हीं अटल जी ने NDA सरकार (1999-2004) के दौरान संसद के सेंट्रल हॉल में अपनी प्रतिबद्धता के चलते वीर सावरकर की फोटो लगाई तो सारे विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया….काश विपक्ष सन 1977 की घटना से सबक ले सकता….काश विपक्ष समझ पाता कि जिस व्यक्ति ने कांग्रेस की मरणावस्था में भी विरोधी होते हुए कांग्रेस का मान बनाए रखा वो भला कैसे वीर सावरकर की तस्वीर लगाने भर से कोई अनुचित काम कर सकता है !

