बच्चों को लेके पिकनिक जाना था ,
पर पापा तो रैली में गए हैं ,
घर का राशन लेने जाना था ,पर दुकानदार तो रैली में गए हैं ,
बूढ़ी दादी को तेज बुखार खांसी है कौन ले जाये अस्पताल ,
अरे बड़के भइया भी तो रैली में हैं।
बच्चे बस स्टाप पर बस की राह देख देख घर लौट आये
क्न्योकि सारी बसें तो रैली में भिजवा दी गई हैं।
चिलचिलाती धुप में स्टेशन के बाहर यात्री खड़े हैं
कयोकि ऑटो टेक्सी तो सब रैली में गए है ,
दादाजी ने कड़कड़ा कर बहु को लगाई आवाज
क्या बिना दूध के ही मिलेगी चाय आज ,
बाबूजी क्षमा करें सारे दूध वाले रैली में गए हैं।
बेटी की बारात में ५०० की जगह ५० लोग ही आये ,
पता चला की बाकि सब लोग तो रैली में गए हैं।
पड़ोस की बहु की जचकी होने वाली है -कोई एम्बुलेंस तो बुला दो ,
कहाँ से आएगी एम्बुलेंस वो तो सरकारी ड्यूटी पर रैली में गई है ,
रास्तों पे जाम लगे हैं ,हर चीज के दाम बड़े हैं ,
हर गली नुक्कड़ पर पोस्टर लगे हैं ,एक एक दीवार पर दस दस चेहरे डटे हैं।
चारों तरफ तीतर बितर भागते लोग ,कहीं चाय की चुसकिन्य लेते कहीं अपशब्दों की बौछार करते लोग।
हवा में लहराते झंडे और पैरों तले कुचले जा रहे फूल ,
किस उद्देश्य को ले कर निकाली जा रही ये रैलिंया हैं
जहाँ सभ्यता की सभी हदें पार कर रहीं ये नारेबाजिंया है ,
गली गली में गूंजते अपशब्द और गालिन्य हैं।
क्या यही हमारी सभ्यता और संस्कृति की पहचान है ,
क्या अब हम ये मान लें की ऐसा ही हमारा देश है और यही हमारी पहचान है
– नीरा भसीन- ( 9866716006 )

