चुनावी मैदान में चित हुए राजनीति के ‘स्वयंभू चाणक्य’ से हमने उनकी शर्मनाक पराजय का कारण पूछा, तो वे बगले झांकने लगे. फिर गहरी सांस लेकर बोले, ‘वे मुंगेरीलाल… मुफ्त का माल बांटने के कारण ही जीते हैं. अगर मुफ्त बिजली-पानी का मुद्दा वे नहीं उठाते, तो हम उन्हें सत्ता से जरूर हटाते!’ उनके चेहरे पर हार का गम था… लेकिन उनकी बात में दम था. फिर भी हमने उन्हें छेड़ा, ‘लोगों ने तुम्हारी ध्रुवीकरण की राजनीति को नकार दिया है. इसलिए व्यर्थ के बहाने मत बनाइए. सिर्फ ‘सबका साथ सबका विकास’ की बात कीजिए. जनता को और अधिक मत बरगलाइए!’