भावार्थ —– खिले हुए कमलपत्र जैसे आकर्ण नेत्रों वाले विशाल बुद्धि वाले हे व्यासदेव !जिन्होंने आपके द्वारा महाभारत रुपी तेल से भरा ज्ञानमय दीप जलाया उनको नमस्कार है।
o vayasa the one whose intellect is vast ,whose eyes are clear and as pleasing as a fully blossomed lotus who lit the lamp of knowledge well by filling it oil of the Mahabharata ‘to you my salutation .
“गीता ” अमृत के सामान है ,अमृत एक ऐसा तथ्य या भाव या वस्तु है जो मृत्यु को प्राप्त नहीं होता “
अच्छे या बुरे का ज्ञान सार्वभौमिक है। यदि हमारा शरीर “धर्म क्षेत्र “है तो हमारा मस्तिष्क “कुरुक्षेत्र “है। दिन प्रतिदिन के कार्य या दिनचर्या के चलते हमारे विचारों में उन कार्यों के प्रति उथल पुथल मची रहती है लेकिन जब हम स्वाध्याय करने बैठते हैं तो हमारा धयान बिल्कुल ही विपरीत दिशा में चल पड़ता है। जब हम पूजा के स्थान पर या पुस्तकालय या फिर मंदिर या गुरु के पास जाते हैं
तो स्नान आदि कर शरीर को भी उस वातावरण के अनुरूप बनाते हैं। मन की शुद्धि उचित स्थान का चयन -ये आवश्यक है उतना ही जितना की शरीर की शुद्धि। इतना ही नहीं हम जो पुस्तक हाथ में ले कर पढ़ते हैं या उसकी विषय वस्तु की चर्चा करते हैं तो यह क्रिया भी तब तक अधूरी है जब तक की हमारा मन पूर्णरूप से उसके लिए समर्पित नहीं हो जाता।
गीता के दसवें अध्याय में अध्यात्म द्वारा आत्मा और परमात्मा के विलय की बात कही गई है और यह वेदांत का विषय है ,जिसे उपनिषदों में भी दर्शाया गया है। गीता का पाठ रोज किये जाने वाला संध्या पाठ नहीं है ,यह तो जीने की राह दिखाने वाला वेदांत दर्शन है। यह दो लोगों के बीच हुआ संवाद है जिसमे एक ओर अर्जुन साधारण बुद्धि वाला मनुष्य है तो दूसरी ओर श्री कृष्ण जो ज्ञान के अथाह भण्डार हैं।
गीता क्या है —–इसका वर्णन श्री चिन्मय स्वामी जी ने कुछ इस प्रकार किया है
” All other kinds of knowledge that are known to us ,contributed by different sciences, cannot in themselves be called knowledge since each one of them is a limited conditioned “knowledge “,knowledge of Physics ,knowledge of Chemistry,knowledge of Astrology ,knowledge of Mathematics –none of them is knowledge in itself ,but is knowledge of something or other .In THE GEETA ,the theme is knowledge in itself in the light of which alone can all other kinds of knowledge be known .It means the study of GEETA makes a scientist a better scientist and an artist a better artist .All other kind of knowledge can be better acquired and creatively better digested in the light of GEETA .Indeed the divine song is the LAMP of knowledge ”
कहने को तो कहते हैं की गीता में यह स्पष्ट रूप से लिखा है की हमारे कर्म कैसे होने चाहिए। हमने सुना और उसी के अनुसार जीवन में कार्य करने को प्रस्तुत भी हो गए पर यह मात्र नियमों का आँख मूँद कर पालन करना नहीं है। हमारा आधा अधूरा ज्ञान कभी कभी हमें गुमराह भी कर देता है ,हमें इससे नुकसान भी हो सकता है। हमें गीता में दिए गए उपदेशों का अनुसरण नहीं चिंतन करना है और जब हम उसके गूढ़ भाव को समझ लेंगे तभी जीवन का सही अर्थ जान पांएगे।
मेरा अपना विचार है की गीता में जिन कर्मों का व्यवहार का उचित अनुचित परिस्तिथिओं का वर्णन किया गया है वो सब तत्कालीन परिस्तिथिओं की देन था। भारत भूखंड में फैल रही अराजकता भौतिकता के लिए स्पर्धा आदि विषयों के कारण वैसी विषम परिस्तिथिओं ने जन्म लिया निति विरुद्ध या धर्म विरुद्ध या फिर अति के वैभव -संग्रह के कारण वो हालात बने। सभी क्षत्रिय अपने पराये का भेद भूल कर साम दंड भेद वैभव को हथियाने लगे। यदि ये हालात न होते और बात महायुद्ध तक न पहुंची होती तो न तो अर्जुन को दुविधा होती और न ही वो अपने परिजनों से युद्ध करने को उद्धत होता और न ही श्री कृष्ण के समक्ष अपने हथियार डाल युद्ध का मैदान छोड़ कर जाने की बात करता ,फिर तो गीता के उपदेश भी न होते। पर सच्चाई तो यह है की हर युग में दुर्योधन होते हैं और उसका विनाश करने वाला भी होता है ,और राह दिखने को कृष्ण भी अवतार लेते हैं फिर वो देश हो शहर हो गाँव हो समाज या परिवार ही क्यों न हो ये परिस्तिथियाँ छोटे या बड़े रूप में अवश्य आती रहती हैं। सतयुग हो त्रेता युग या फिर कलयुग,ये परिस्तिथियाँ नाम, कारण और विषय परिवर्तन के साथ आती रही हैं और आती रहेंगी ऐसे में हजारों वर्ष पूर्व लिखी या कही गई “गीता ” आज भी उतनी ही उपयोगी है जितनी की कुरुक्षेत्र के मैदान मे थी।
” IN VARIOUS DEGREES,EVERY MAN IS A VICTIM OF THIS “ARJUNA DISEASE ” AND THE “KRISHNA-CURE “BEING SPECIFIC IS AVAILABLE TO ALL OF US AT ALL TIMES IN THE PHILOSOPHY OF THE “GEETA” .”