जिन्दगी : ” पुनर्जन्म “
जब आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेती है तो उस अमुक जीव के अनुसार कार्यरत हो जाती है। पुनर्जन्म की कहानियाँ हमें कई बार सुनने को मिल जाती हैं और ऐसी मान्यताएं भारत की संस्कृति मात्र की नहीं हैं ,पूरे विश्व में इसके उदाहरण मिलते हैं।
फ्लोरेंस (इटली )स्तिथ मानसिक अस्पताल के अवकाश प्राप्त निर्देशक ‘ डॉ. गैस्टोंन उग्र सियोनी ‘ का जिन्हों ने फ्लोरेंस में एक अस्पताल खोल लिया था ,उनका कहना है की पूर्वजन्म में वे मद्रास के निकट (चिन्नई ) महाबलीपुरम में एक मंदिर के पुजारी थे। वे कहते हैं की जब वे ७ या ८ वर्ष के थे ,उन्हें एक स्वप्न आया ,जिसमे उन्होंने स्पष्ट देखा की वे एक मंदिर के पुजारी हैं। उन्होंने यह भी बताया की उन्हें उस समय तक महाबलीपुरम के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था ,न ही वे वहां के किसी व्यक्ति को जानते थे यहाँ तक की भारत के बारे में भी कुछ नहीं जानते थे। उन्होंने बताया की एक बार उनको भारत जाने का अवसर मिला और वे पहली बार महाबलीपुरम के मंदिर गए। वहां पर बहुत सूंदर मंदिर थे और ऐसा भी लगता था की कुछ मंदिरों में वे पहले भी गए थे। डॉ. साहब ने उस मंदिर को देखते ही पहचान लिया। उनका कहना था की भारतीय धर्म ग्रंथों में भी उनकी बहुत रूचि रही है और जो निरंतर बढ़ती जा रही थी। उन्होंने कहा “जब मैं उस मंदिर में गया तो मुझे एक गहरे भाव की अनुभूति हुई थी। “
यह कोई सपना नहीं था बल्कि भारतीय दर्शन में बढ़ती हुई रूचि भी थी। जिसके कारण उन्हें सोचना पड़ा की क्या वे पिछले जन्म में महाबलीपुरम मंदिर के पुजारी थे। उन्होंने भारत में अजंता की गुफाएं तथा अन्य बहुत से मंदिर देखे ,लेकिन इस प्रकार की अनुभूति उन्हें उन मंदिरों आदि को देखते समय उत्पन्न नहीं हुई।
ऐसी अनगिनत घटनाएं हैं जो प्रमाण के साथ प्रचलित हैं। इसलिए जब ऐसी घटनाओं के बारे में चर्चा करते हैं या पड़ते हैं या सुनाने में आती हैं तो हमें एक बात पर विचार करना चाहिए की किस तरह लोग किसी अनजान जगह या वस्तु का विस्तृत वर्णन कर सकते हैं जब की वे वहां कभी गए ही नहीं ,वे वहां की भाषा और संस्कृति भी नहीं जानते फिर भी वे अमुक स्थान या व्यक्तियों से परिचित होने का दावा करते हैं। यहीं आ कर हमारी सोच परिवर्तित होने लगती है। वो क्या है जिसके बल पर हम चलते- फिरते बोलते -सुनते और अनेकों अनेक कर्म करते हैं -अच्छा और बुरा पहचान पाते हैं –वो क्या है जिसके न रहने पर शरीर का कोई मोल नहीं रह जाता और उसकी अंतिम क्रिया कर उसे जला या दफना दिया जाता है। वो कुछ तो था जिसकी आभा से शरीर जीवित था और जिसके न रहने पर शरीर संज्ञा हींन है , भावना हींन है पीड़ा से परे और विचारों से शून्य है। तो जो भी है वो अब वहां नहीं है ,तो फिर कहीं तो होगा। शायद यही आत्मा है ,शायद यही दूसरे शरीर की खोज में चल पड़ती है और शायद यही वह तथ्य है जिसे कृष्ण
कुरुक्षेत्र में अर्जुन को समझने के लिए उद्धत हुए। अर्जुन को मोह पाश से निकलने के लिए उसे यह समझाना आवश्यक था की यदि हम आत्मा की दृष्टि से देखें तो शोक करने का कोई कारण दिखाई नहीं देता। शरीर रहे न रहे पर आत्मा तो सदैव रहेगी और यह मान लेना उचित होगा की ‘मैं ‘ आत्मा हूँ और शास्वत हूँ। एक नए शरीर के साथ एक नई शुरुवात यह समय और नियति का चक्र है जो निरंतर चलता रहता है।
पी. नारायण गौड़ ने वृहद उपनिषद का उदाहरण देते हुए लिखा है ——-
“As a large fish moves along the two banks of a river ,the right and the left ,so does that person move along the two states ,the state of dreaming and the state of wakening. And as a falcon ,or any (swift) bird ,after he has roamed about here and there in the air ,becomes tired folding his wings is carried to his nest ,so does that person hasten to that state (sushupti) where ,when asleep ,he desires and dreams no more dreams .”This state of sushupti where no desires ,no dreams ,no perception and in short ,where intellectual (thinking or thought ) has temporarily ceased to function ,is the third or Brahmlok ( देव लोक ) .
ज्ञानी पुरुष सत्य और असत्य का भेद जानते हैं और वे ये भी जानते हैं की आत्मा क्या है और अनात्मा क्या है। जो कुछ परिवर्तनशील है उसे कोई रोक नहीं सकता। यह जीवन का चक्र है जिसे हम दो तरह से देख सकते हैं ,पल पल आगे बढ़ता या फिर जन्म से ही पल पल घटता और समय आने पर शेष हो जाना। ये दोनों विचार एक दूसरे के पर्याय हैं ,जो जन्म लेता है वह शेष भी होता है और उसे कोई रोक नहीं सकता और जो अपरिवर्तनीय है वो है ,उसका न कोई कुछ बना सकता है न कुछ बिगड़ सकता है। इस तथ्य को समझना ज्ञानी पुरुष के लक्षण हैं और इसी कारण वे निरर्थक शोक कर व्यतिथ नहीं होते और अपने कर्तव्य मार्ग पर डटे रहते हैं। “मैं एक आत्मा हूँ और मुझे समय के साथ बाँधा नहीं जा सकता –मैं अमर हूँ अजर हूँ। श्लोक १४ —-भावार्थ ,
हे कौन्तेय ;इन्द्रियों और विषयों के संयोग शीत -उष्ण और सुख दुःख के देने वाले हैं। वे आते हैं और नष्ट हो जाते हैं ,इस लिए अनित्य हैं। हे भरतवंशी (अर्जुन) तू उन्हें सहन कर।
किसी वास्तु विशेष या व्यक्ति विशेष की पहचान उसे दिए गए नाम से होती है और दूसरी दिए जा रहे विशेषण से। वो वस्तुंए जो प्राणहीन हैं वो अपनी योग्यता ,पात्रता और उपयोगिता के आधार पर अपना नाम पाती हैं और वो नाम भाषा,स्थान या आकार के आधार पर होता है। एक ही वस्तु के भाषाओं में भिन्नता होने के कारण कई नाम हो सकते हैं पर उनका अर्थ एक ही होता है अन्य जीव धारी
भी अपने नाम के कारण जाने जाते हैं ,किसी नाम उच्चारण जीव का चित्र आँखों के सामने आ जाता है परन्तु मानव जाति में ‘नाम ‘ही एक मात्र परिचय नहीं है ‘नाम ‘ माता पिता की भावनाओं का ध्योतक है।
किसी भी व्यक्ति को हम उसके कर्मों से पहचानते हैं ,उसकी विशेषताओं से पहचानते हैं ,उसके परिवार के कुल के कबीले के नाम व लक्षणों से पहचानते हैं। गीता में अर्जुन को कई बार भिन्न भिन्न नामों से सम्बोधित किया इसका उद्देश्य भी यही था की वो कृष्ण की बात ध्यान पूर्वक सुने ठीक उसी तरह जैसे कोई माँ अपने बालक के गुणों का बखान कर उसका ध्यान अपनी तरफ खींच लेती है ,ताकि बालक उसकी बात ध्यान पूर्वक सुने ,समझे और तदानुसार कार्य करे। यहाँ इस श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन को कौन्तेय कह कर संबोधित किया अर्थात अर्जुन कुंती का पुत्र है जो कर्तव्य का पालन करने में और धर्मानुसार आचरण करने का प्रतीक है। कृष्ण चाहते हैं की अर्जुन भी अपनी माँ की तरह व्यवहार करने में सक्षम है और अपनी माँ के सामान ही परिस्तिथियों को देखते हुए अपना कर्तव्य निर्धारित कर सकता है।
इसी श्लोक की दूसरी पंक्ति के अंत में कृष्ण को राजा भरत के वंशज कह कर पुकारा उन्हें अर्जुन से राजा भरत के सामान प्रजा के हित में धर्म का पालन करने की आशा थी क्योंकि वो एक महान राजा का वंशज था और उसे अच्छे बुरे का ज्ञान था। इस समय कृष्ण की आवाज में एक माता जैसा दुलार था, जननी जब जब अपने बच्चों को कोई बात समझाती है तो उसके अंदर निहित गुणों का बखान करती है ,उसकी क्षमता की सराहना करती है ,वो इस लिए की बालक को अपनी माता पर सबसे अधिक विशवास होता है और वो उसकी बात पूरे ध्यान से सुनता है और मानता भी है —इसी तरह गुरु और शिष्य के बीच का संबंध भी होता है। शिष्य को सदा इस बात पर विशवास होता है की गुरु उसे जो भी शिक्षा देता है वो उसके कल्याण के लिए ही होती है ,और जो भी आदेश देता है उसका पालन करना शिष्य का कर्तव्य है क्योंकि
भी शिष्य का कल्याण ही होता है। यहाँ इन क्षणों में अर्जुन अपने सारथि कृष्ण को अपना गुरु धारण कर चुके हैं और कृष्ण भी अपना उत्तरदाईत्व ही निभा रहे हैं।