
भावार्थ — तू (यदि युद्ध में ) मारा गया तो स्वर्ग को प्राप्त होगा
अथवा जीत कर पृथ्वी को भोगेगा। अतः हे कौन्तेय युद्ध के लिए दृढ़
निश्चित हो कर उठ खड़ा हो।
हम जब भी कोई कार्य करते हैं पहले उसके फल का क्या होगा ,इस पर विचार विमर्श करते हैं। किसी भी प्रकार के लाभ हेतु
किये जाने वाले कार्य को प्राथमिकता दी जाती है। श्रम कर उस कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए हर प्रकार के प्रयास किये जाते हैं। यह मानव जीवन की एक सोच है जिस पर। ‘ कर्म’ आधारित हैं। आवश्यक नहीं की प्रत्येक कार्य में सफलता मिल ही जाएगी ,पर उद्देश्य सब का सफलता प्राप्त करना ही होता है। अब हम उस कार्य में यदि अपने को पूर्ण रूप से समर्पित नहीं करते तो हो सकता है हमें सफलता भी मनोवांछित ना मिले। यदि ऐसा होता है तो अंत में हम हाथ मलते ही रह जायेंगे। पर दूसरी ओर कुछ कार्य ऐसे भी होते हैं जिनमे पराजय हो या जय लाभ निश्चित है। आमिर खुसरो ने दो पंक्तियाँ कुछ यूँ लिखी हैं —
” खुसरो बाजी प्रेम की , मैं खेलूं पिया पी के संग।
जीत गई तो पिया मोरे , हारी तो पी के संग || “
बात कोई भी काम लगन से करने की है ,अंत में खाली हाथ रह जाएँ इसकी संभावना कम है। दूसरे अध्ययाय के सातवें श्लोक में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा है कि वो नहीं जानता उसके लिए श्रेयकर क्या है क्योंकि अभी वह कायरता के दोष से ग्रसित है और मोह ग्रसित भी है। उसे समृद्ध राज्य की या सुख और वैभव पाने की कोई इच्छा नहीं है जो उसे विजय प्राप्त करने पर राज्य के साथ मिलेगा।
पर कृष्ण की दृष्टि में यह उचित नहीं है। इसलिए उपरोक्त श्लोक में वे अर्जुन का साहस बढ़ाते हुए कहते हैं की ये धर्म युद्ध है और धर्म की रक्षा के लिए ही लड़ा जा रहा है। अर्जुन के समक्ष कर्ण ,
भीष्म पिता मह ,गुरु द्रोण आदि महायोद्धा युद्ध के लिए उपस्तिथ हैं।
युद्ध की यलगार हो चुकी है और अब अर्जुन के लिए यही उचित है की
वह भी शस्त्र उठाये और युद्ध करे। युद्ध करने का लाभ तो उसे अवश्य मिलेगा चाहे उसकी जय हो या पराजय। यह भी संभव है की युद्ध करते हुए वह वीरगति को प्राप्त हो जाता है तो कालांतर में वह एक वीर
योद्धा के रूप में ही याद किया जायेगा। लेकिन यदि उसकी जीत होती है तो उसे संसार में रह कर सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होगी।
ऐसे में लोग भी धर्म की राह पर चल कर सुख पूर्वक जीवन व्यतीत
करेंगे। इसलिए जब सब तरह से लाभ अर्जुन का ही है तो एक वीर योद्धा के धर्म का निर्वाह कर अनंतकाल तक यश का भागी बनने में अर्जुन को भयभीत नहीं होना चाहिए। परन्तु यह मानवीय मोह जाल
की एक ऐसी विवशता है जिसका धर्म के सामने कोई मोल एक साधारण व्यक्ति को समझ में नहीं आता। अर्जुन जो सोच रहा था वह
मोह का बंधन था जो अक्सर मनुष्य को कमजोर बना देता है -यही तो अर्जुन के साथ हुआ। इस लिए श्री कृष्ण अर्जुन को बहुत सनेह पूर्वक
उठने का अनुरोध करते हैं। वे चाहते हैं की अर्जुन अपनी शारीरिक
शिथिलता का त्याग कर युद्ध के लिए तत्पर हो और मानसिक शिथिलता का त्याग कर शस्त्र धारण करे।
बात बहुत गहरी है, किसी भी काम को तब तक नहीं किया जा सकता जब तक की उसे तन और मन से स्वीकार ना किया जाये , मन की दुविधा तन के प्रत्येक प्रयत्न को असफल बना देती है। हम सब भी अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या में अधिकतर कहते रहते हैं की अमुक काम करने में मन ही नहीं लग रहा। विचारों की इच्छाशक्ति ,मन की इच्छाशक्ति ,अपनी इच्छाओं को पूरा करने की इच्छाशक्ति या फिर किसी व्यक्ति विशेष या देश काल पर समर्पित हो जाने की इच्छाशक्ति यदि प्रबल नहीं है तो तन का शिथिल हो जाना स्वाभाविक है। इसी मनस्तिथि को सुलझाने का प्रयास श्री कृष्ण कर रहें हैं। हम यदि इस बात पर जरा सा ध्यान दें तो जान लेंगे की हम सब के जीवन ऐसी परिस्तिथियाँ आती रहती हैं। ज्ञानी पुरुष इसमें से उभर आते हैं और अज्ञानी अपनी विवशतायों के कारण उसी में उलझे रहते हैं। ऐसे लोग जीवन भर या तो पश्चाताप करते रहते हैं या फिर कष्ट उठाते रहते हैं। इसे साधारण हिंदी भाषा में ‘आलस्य ‘ कहा गया है। स्वामी विवेकानंद जी के विचार में —
” कर्म योग का संबंध मुख्यतः इन तीन गुणों से है —
१। सत्व ,२ रज ,और ३ तम ,तम की व्याख्या अन्धकार तथा कर्मशून्यता के रूप में होती है , रज की कर्मशीलता अर्थात आकर्षण एवं विकर्षण
के रूप में और सत्व इन दोनों की साम्यावस्था तथा संयम रूप
होता है। ” ऐसा विवेकानंदजी ने अपनी पुस्तक कर्मयोग में कहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है की यह शरीर और मस्तिष्क में एक प्रकार के रसायन का प्रभाव जान पड़ता है जिसका सबसे अधिक प्रभाव विचारों पर पड़ता है। आज समाज में कुरीतियों की जड़ें बहुत तेजी से फ़ैल रही
हैं जिसका आने वाली पीढ़ियों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ रहा है। द्वापर में भी श्री कृष्ण ने अर्जुन को शिथिलता त्यागने और विचारों को दृढ़ बनाने का अनुरोध किया था। आज हमारा कर्तव्य है की हम अपनी
भावी पीढ़ी को जागरूक बनायें और उनका उचित मार्ग दर्शन करें।
श्लोक 38 —-अध्ययाय 2
भावार्थ —सुख दुःख ,लाभ हानि ,जय -पराजय ,को समान समझ कर फिर तू युद्ध के लिए तैयार हो जा। इस प्रकार (युद्ध करने से ) तू
पाप को प्राप्त नहीं होगा।
उपरोक्त पंक्तियाँ जो श्री ने अर्जुन को कहीं थीं -वो ऐसा लगता है तत्कालीन परिस्तिथियों में नहीं ,हजारों वर्ष के भविष्य को ध्यान में रख कर कही गई थीं। यह बात यदि उस युग में इतनी सार्थक थी तो आज के युग में इसे क्या मानें। परिवर्तन लगता है केवल पात्रों का है कर्म और विचारों में कोई परिवर्तन हुआ हो -ऐसा तो दिखाई नहीं पड़ता। हाँ इस बीच समय की धारा अविरल बहती रही है। एक बात ध्यान देने योग्य है
की इस युद्ध में दुर्योधन राग द्वेष की आग में जल रहा है और साम- दाम
दंड भेद अपने एक छत्र राज्य प्राप्ति के उद्देश को पूरा करना चाहता है
वह क्रोध और अहंकार में चूर युद्ध करने को अधीर है तो अर्जुन विपक्ष में अनुराग और मोह से ग्रसित है ,यहाँ तक की युद्ध भूमि त्यागने को
आतुर है।
कुरुक्षेत्र में धर्म का निर्वाह अनिवार्य था। दुर्योधन का पक्ष अधरम का था और अर्जुन को अधरम का नाश कर धर्म की संस्थापना
करनी थी। ऐसे में प्राणों का मोह वो अपना हो या अपनों का हो
शिथिलता का कारण बन जाता है। विचारों की शिथिलता को दूर करने के लिए ही श्री कृष्ण -अर्जुन को आत्मा का और आत्मा के नित्य
होने का रहस्य बताते हैं।