नई दिल्ली ( तेजसमाचार संवाददाता ) – अटलजी के प्रेरक जीवन के अविस्मरणीय प्रसंगों को विभिन्न पुस्तकों और स्रोतों से अटलनामा के जरिए एक मीडिया मित्र ने सुन्दर संकलित किया है. हिन्दुस्तान को परमाणु संपन्न कर विश्व पटल पर स्थान दिलाने वाले पूर्व प्रधानमन्त्री, राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक, पत्रकार, कवि, ओजस्वी वक्ता, करोड़ों भारतवासियों के आदर्श अटल बिहारी वाजपेयी का स्मरण करते हुए तेजसमाचार.कॉम की श्रध्दा सुमनों के साथ प्रस्तुति :- भाग 02
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secularism के मुद्दे पर अटल जी ने भरी संसद में इंदिरा जी की बोलती बंद कर दी !
यह बहस 31 मार्च 1971 की है. बांग्लादेश अपने ‘निर्माण’ की लड़ाई लड़ रहा था और पाकिस्तान उस आंदोलन को बड़ी नृशंसता से कुचल रहा था. संसद में बहस के दौरान अटल जी ने कहा – ” जब कभी शांति को खतरा होगा,स्वतंत्र देशों की स्वाधीनता नष्ट होगी और उपनिवेशवाद को पुराने या नए रूप में लाने की कोशिश की जाएगी तब-तब हमारी आवाज उठेगी.पूर्वी पाकिस्तान की जनता और वहां के लोकप्रिय नेता शेख मुजीबुर्रहमान के साथ हमारा समर्थन है और अगर पूर्वी बंगाल की सरकार को मान्यता देने की मांग भारत के पास आती है तो उसे मान्यता देनें में हमें संकोच नही करना चाहिए. हम शेख मुजीबुर्रहमान का अभिनंदन करना चाहते हैं. मजहब के आधार पर राष्ट्रीयता नहीं चलेगी-यह पूर्वी बंगाल का सबसे पहला पाठ है……”(तभी इंदिरा जी ने टोक दिया)
इंदिरा जी ने कहा – ”आपको और आपकी पार्टी को भी इसे सीखना चाहिए.
इसके जवाब में अटल जी ने कहा – ”उपाध्यक्ष महोदय…जब देश का बंटवारा हुआ उस वक्त तो हमारी पार्टी थी भी नहीं. यदि हम इतने शक्तिशाली थे कि अपने जन्म के पहले ही हमने देश का बंटवारा कर दिया तो इस अपराध को स्वीकार करने के लिए मैं तैयार हूँ. मगर हमारे जन्म के पहले ही बंटवारा हुआ और जो बंटवारा करने के लिए जिम्मेदार हैं मैं उनकी तरफ उंगली नहीं उठाना चाहता.धर्म के नाम पर जिनके सामने देश बंट गया वो हमें किसी भी तरह की सीख नहीं दे सकते हैं.”
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अटलजी का क्रिकेट प्रेम
अटल जी की एक तस्वीर है भारतीय क्रिकेट टीम के शीर्ष चेहरों के साथ -सचिन तेंदुल्कर,सौरव गांगुली,वीरेंद्र सहवाग,राहुल द्रविड़ और आशीष नेहरा. 2003-04 के पाकिस्तानी दौरे से पहले दिल्ली में अटल जी ने मुलाकात कर भारतीय टीम को एक बल्ला उपहार स्वरूप भेंट किया था और
उस समय पूरी टीम को पाकिस्तान में जो करने के लिए कहा था वह आज क्रिकेट डिप्लोमेसी के लिए मील का पत्थर है. अटलजी ने भारतीय टीम के बड़े खिलाड़ियों से कहा था कि ‘’पाकिस्तान जाकर मैच तो जीतो ही जीतो पर साथ में वहां के लोगों और खिलाड़ियों का दिल भी जीतना. पूरी टीम को मेरी तरफ से शुभकामनाएँ.”
तब भी भारतीय टीम ने श्रृंखला जीत कर अटल जी की बात का मान रखा था. 2002 में हुई भारत-पाक श्रृंखला में भी अटल जी ने पूरी भारतीय टीम से भेंट की थी. ये दिखाता है कि अटल जी पुरानी टहनियों पर भी नई कोपलें उगानें में माहिर थे. अटल जी हर उस खेल से दिल लगा लेते जहाँ भारत के सम्मान की बात होती…पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे अटल जी की असली मंशा पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर करने की रही. इसके लिए अटल जी ने खेल को भी एक माध्यम के रूप में देखा और भारतीय टीम का हर तरह से मनोबल बढ़ाया. अटल जी उल्लास के छड़ों में भी देश की फिक्र करते रहते.
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चुनावी हार से निराश कार्यकर्ताओं को अटलजी कहते थे-
”भारतीय जनती पार्टी चुनाव में कुकुरमुत्ते की तरह उगने वाली पार्टी नही है. ये 365 दिन चलने वाली पार्टी है. 365 दिन.
…हमारी पृष्ठभूमि खुद को तपा कर राष्ट्रसेवा करने वालों की रही है. मानव सेवा करने वालों की रही है. इस सेवा में लोभ और सत्ता मीलों पीछे है. हमारा इतिहास रहा है कि हमने कभी सत्ता के लिए राजनीति नही की. कभी ईनाम के लिए कार्य नही किए. हम सर्वस्व आहुति देने वालों में से हैं. इस जन्म में ये प्रण लेने वालों में से हैं कि अगला जन्म भी मातृभूमि के ही नाम रहेगा. देश सेवा में सौदे बाजी नही होती और भारतीय जनता पार्टी का एक एक कार्यकर्ता इस बात से परिचित है. हम असफल हो सकते हैं,पराजित नहीं क्योंकि जिसके साथ राम हैं वो कभी पराजित नही हो सकता, हाँ क्षणिक विफलता से सामना जरूर हो सकता है पर अंतिम विजय के नसीबदार हमीं होंगे. मन,आत्मा और जिह्वा- इन सबकी शुद्धि से हमें युद्ध लड़ना है,कर्म करना है औऱ फिर विजय का आनंद लेना है.
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आरक्षण जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर क्या थी अटल जी की राय ?
” आरक्षण का कार्य सरकारों ने इतनी जल्दबाज़ी में और फूहड़ता से किया कि सरकार ने ना तो खुद अपने समर्थक दलों को विश्वास में लिया और ना ही देश के भीतर विशेषकर नौजवानो में अनुकूल राय बनाने का प्रयत्न किया. इसके बावजूद यदि पहले दिन ही यह घोषणा कर दी जाती कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के साथ आर्थिक पिछड़ेपन को भी देखा जायेगा और सामाजिक दृष्टि से अग्रणी समझे जाने वाले वर्गों के नौजवानों को भी उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार नौकरियों में कुछ सुरक्षित स्थान दिए जायेंगे तो आरक्षण विरोधी स्वर मुखर ना होते.
नौजवानो को संदेह हुआ की पिछड़े वर्ग के लिए 27% आरक्षण देने की घोषणा किसी सामाजिक न्याय भावना से नहीं बल्कि सत्ता कायम रखने की भावना से प्रेरित है. जनतादल सरकार के ऐसे पतन से ये बात साबित भी हुई. आजादी के बाद से नीतियाँ प्रभावित कम प्रेरित ज्यादा थी, तभी तो दशकों के कालखंड के बाद भी हमारे पिछड़े भाइयों के साथ न्याय नही हो पाया उल्टा खाई और असमान होने लगी.
आरक्षण का मामला इतना नाजुक है की इसे बेहद संभल कर हाथ लगाने की जरुरत है. रोजगार के घटते हुए अवसरों और नौजवानो की बढ़ती हुयी अपेक्षाओं में संतुलन कायम रखना ऊंचे दर्जे की नीतिमत्ता की मांग करता है. यह कार्य ना तो जाती द्वेष को हवा देकर पूरा किया जा सकता है और ना ही इसे वोट की राजनीति से जोड़कर हल निकाला जा सकता है….इस प्रश्न पर जब तक एक राष्ट्रीय आम सहमति ना हो तब तक इस चिंगारी से खेलना खतरनाक है.”

