नुष्य के आस्तित्व में आने के बाद अर्थात जन्म से पहले ही उसमें पल पल परिवर्तन होने लगते हैं। शरीर का ,बल का ,बुद्धि का पल पल परिवर्तन होता रहता है। यह एक अविराम निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मात्र जीवधारी ही नहीं अंकुरित वनस्पति आदि भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। मनुष्य के शारीरिक विकास की अवधि एक निश्चित सीमा रेखा तक है ,उसके बाद धीरे धीरे क्षय की प्रक्रिया आरम्भ होती है जीवन काल में एक ऐसा भी समय आ जाता है जब ज्ञानेन्द्रियाँ धीरे धीरे क्षीण हो कर लुप्त होने लगती हैं ( कुछ लोग इस प्रक्रिया से कम प्रभावित होते हैं या देर से प्रभावित होते हैं ऐसा भी अक्सर देखा गया है )इस सारी प्रक्रिया की विवेचना पूर्वक चर्चा करें तो हर किसी में उतार चढ़ाव ,मानसिक क्रियांए प्रतिक्राएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं चहुँ ओर परिवर्तन होता दिखाई देता है। भौतिकता और आध्यात्मिकता -ऐसे विचार भी रूप बदलते रहते हैं। प्राकृति का रूप भी बदलता रहता है -कभी शांत तो कभी आक्रोश में विनाश करती ये प्राकृति अपने आप में कार्यविंत रहती है। सागर के तट नदियों के किनारे ,पर्वतों की चोटियों