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जिन्दगी : परिवर्तन

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Neera Bhasinनुष्य के आस्तित्व में  आने के  बाद अर्थात जन्म से पहले ही उसमें पल पल परिवर्तन होने लगते  हैं। शरीर का ,बल का ,बुद्धि का पल पल  परिवर्तन होता रहता है।  यह एक अविराम निरंतर चलने वाली  प्रक्रिया है। मात्र जीवधारी ही नहीं अंकुरित वनस्पति आदि भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। मनुष्य के शारीरिक विकास की अवधि एक निश्चित सीमा रेखा तक है ,उसके बाद धीरे धीरे क्षय की प्रक्रिया आरम्भ होती है जीवन काल में एक ऐसा भी समय आ जाता है जब ज्ञानेन्द्रियाँ धीरे धीरे क्षीण हो कर लुप्त होने लगती हैं ( कुछ लोग इस प्रक्रिया से कम प्रभावित होते हैं या देर से प्रभावित होते हैं ऐसा भी अक्सर देखा गया है )इस सारी  प्रक्रिया की विवेचना पूर्वक  चर्चा करें तो हर किसी में उतार चढ़ाव ,मानसिक क्रियांए प्रतिक्राएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं चहुँ ओर परिवर्तन होता दिखाई देता है। भौतिकता और आध्यात्मिकता -ऐसे विचार भी रूप बदलते रहते हैं। प्राकृति  का रूप भी बदलता रहता है -कभी शांत तो कभी आक्रोश में विनाश करती ये प्राकृति अपने आप में कार्यविंत रहती है। सागर के तट नदियों के किनारे ,पर्वतों की चोटियों 
को भी समय समय पर रूप बदलते देखा है -यहीं पर आ कर या कहें की यह सब देख सुन कर समझ कर  और परिवर्तन का हिस्सा बन कर एक विचार  मन में उठ खड़ा होता है कि हमारी आत्मा में जीवन भर न तो कोई परिवर्तन आया और न ही उस पर हो रहे किसी परिवर्तन का कोई प्रभाव ही पड़ा। यहाँ  एक बात ध्यान देने  की है कि परिवर्तन के  प्रभाव हमारे विचारों पर पड़ते हैं ,हमारे कर्मों पर पड़ते हैं ,हमारे व्यवहार पर पड़ते हैं ,हमारी रूचि अरुचि 
पर पड़ते हैं ,शरीर की धमनियों में बह रहे खून पर पड़ते हैं पर आत्मा पर कदापि नहीं। इस ब्रह्म  स्वरुप के जिस अंश ने शरीर में जिस  
दिव्यस्वरूप के साथ प्रवेश किया था  समय आने पर उसका त्याग कर वह  आत्मा फिर से उसी दिव्यस्वरूप के साथ  ब्रह्म में लीन हो गई। बाकि जो रहा  वो वही था जिसका विकास और ह्रास समय के अनुसार हो रहा था। दुःख भोगे शरीर ने ,
सुख भोगे शरीर  ने, अच्छे विचारों से अमुक व्यक्ति अच्छा बना और बुरे विचारों से बुरा। पर जब जब मनुष्य ने अपने भीतर बसे आत्मस्वरूप को -ब्रह्म स्वरुप को पहचाना तो  उसे जीवन रहते ही परम शांति का अनुभव हुआ अच्छे बुरे का दुःख सुख का सब भेद मिट गया।  यह मात्र वही जान सका जिसने  ‘उसे ‘जाना। अर्थात जिसे आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ। 
  परिवर्तन से आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता तो जब आत्मा कर्ता भी नहीं है ,अकर्ता भी नहीं है तो उस पर बोझ कैसा। श्री कृष्ण ने अर्जुन को भी आत्मा के ब्रह्म स्वरूप को समझाने का प्रयास किया। 
श्लोक २१ अध्याय २ 
भावार्थ –हे पार्थ !जो  व्यक्ती इस(आत्मा)कोअविनाशी ,नित्य  ,जन्मरहित और अव्यय जानता है,वह कैसे किसको मरवाये और कैसे किसको
मारे ?
                  यहाँ तक तो अर्जुन के मन में एक ही दुविधा उठती दिखाई दे रही है की -मनुष्य का धर्म क्या है -और हम स्पष्ट देख पा रहे हैं की इसी दुविधा के कारण अर्जुन को आगे बढ़ कर युद्ध करने में भय प्रतीत हो रहा है ,अर्जुन की इस दशा को कृष्ण स्पष्ट देख पा रहे हैं और समझ चुके हैं की अर्जुन अपने कर्तव्य और आत्मा अर्थात ‘ईश्वर ‘के भेद को 
समझ नहीं पा  रहा है। इसलिए वे अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं की जो मनुष्य इस धारणा में विशवास करता है की आत्मा किसी का संहार कर सकती है या फिर कोई अन्य कृत्य कर सकती है -उसे ऐसा सोचने से पहले ‘आत्मा ‘के स्वरूप को को समझने की चेष्टा करनी होगी। 
लेकिन यह बात उतनी सहज भी नहीं है जितनी सहजता से हम उसे 
कह देते हैं प्रस्तुत श्लोक में यही तो समझाने का प्रयास किया गया है 
की जो मनुष्य आत्मा को शाश्वत मानता है और उसे जीवन में हो रहे 
उतार चढ़ाव ,अच्छे -बुरे या लाभ हानि के कृत्यों से परे मानता  है ,वही आत्मा के स्वरुप को समझने का अधिकारी है। हम नित्यप्रतिदिन 
होने वाले कर्मों में उलझे रहते हैं।,पल पल दुखी और पल पल प्रसन्न होते रहते हैं ,अपने कृत्यों का श्रेय आत्मा को देते हैं -यह एक भ्रम है -सर्वथा भ्रम है ,जो रूप से परे ,स्पर्श से परे ,गंध से परे ,हर बंधन से परे है उसे दोषी कैसे मान सकते हैं। हाँ यह कह कर हम अपने कृत्यों को  विचारों को  या उचित अनुचित व्यवहार को अंतर्मन  की आवाज  कह कर अपने सर का दोष हटा देते हैं। जब कुछ बुरा करने के विचार मन में उठते हैं तो वहीँ उसके प्रतिरोध करने की चेतावनी भी विचारों को 
सावधान रहने के संकेत देती है ,पर हमारी प्रबल इच्छाएं और अहंकार सब अनदेखा और अनसुना कर देते हैं। अब ऐसे में जो भी होता है या हो रहा है या होगा वो हमारी सोच का परिणाम ही होगा ,हमारे अहंकार का परिणाम होगा जो स्वयंम के लिए होगा ,और निश्चित जानिए इसमें किसी दूसरे की भलाई कभी  नहीं होगी। विचार जन्म लेते हैं कर्मों को आगे बढ़ाते हैं।जन्म  शरीर का होता है , आत्मा का नहीं।आत्मा मात्र दृष्टा है।  विचारों का प्रभाव मन, बुद्धि  ,वचन और कर्मों को जन्म देता है। समयानुसार शरीर में परिवर्तन होते हैं ,विचारों में भी परिवर्तन होते हैं ,कर्मों में भी परिवर्तन होते हैं पर आत्मा –यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है ,यह प्रश्न पहले भी था आज भी है और भविष्य में भी रहेगा। आत्मा का जन्म नहीं होता और न ही इसमें कोई परिवर्तन होता है।  यह एक ईश्वरीय तत्व है और जब तक यह शरीर में है हम उसे जीवित मान कर चलते हैं जब आत्मा शरीर का त्याग कर देती है तो फिर शरीर का भी कोई औचित्य नहीं रह जाता। आत्मा से रहित शरीर को कोई संभाल कर नहीं रखता। उसे प्रकृति को वापिस सौंप दिया जाता है।  वो क्या था जिसने एक दिन  शरीर में प्रवेश किया और फिर एक दिन उस शरीर का त्याग भी कर दिया।आत्मा को  न किसी ने आते देखा न किसी ने जाते लेकिन फिर भी हम इसे नकार नहीं सकते –जहाँ आत्मा का होना एक सच है वहां यह भी सच है की जीवन में कर्मों को करने ,धर्म को निभाने या व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से चलाने में आत्मा में कोई फेर बदल नहीं होता न ही वो विचारों और कर्मों के अनुसार रूप धारण करती है। 
                 श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा -जब तुम्हें  यह ज्ञान  प्राप्त हो जायेगा  की आत्मा अमर है अजर है ,अजन्मा है और जो कभी शेष नहीं होती ,तो तुम्हारे मन में यह विचार आना की तुम कौरवों का युद्ध में संहार नहीं कर सकते -यह एक  मूर्खता पूर्ण धारणा है- तुम यह समझ पाओगे । जब आत्मा अमर है तो ना तो  कोई किसी का संहार  कर सकता है और न ही स्वयं को पाप का भागी  मान सकता है इस श्लोक की यदि हम ध्यान पूर्वक विवेचना करें तो देखेंगे की 
यहाँ कृष्ण स्वयं को आत्मस्वरुप   मान कर उपदेश दे रहे हैं जिन्हें ईश्वरीय तत्व का ज्ञान है। वे अर्जुन को जो भ्रम में पड़ा निराशा के अन्धकार में डूबता जा रहा है ,उसे सही राह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। आत्म ज्ञान देने का यह एक अद्भुत प्रयास है।जिस तरह  प्रकाश के समक्ष अन्धकार का आस्तित्व टिक नहीं पाता ठीक उसी तरह ज्ञान का प्रकाश होना भी आवश्यक है ताकि अज्ञान के अन्धकार को दूर किया जा सके। 
कुरुक्षेत्र की इस विकट घड़ी  में ऐसा उपदेश देना श्री  कृष्ण का यह एक अनुपम प्रयास माना जाता है।