मृत्यु एक ऐसी अवस्था है जिससे बच निकलने तो प्रश्न ही नहीं उठता पर हम उसे दूर भगाने में एक के बाद एक प्रयत्न करते जाते हैं। जन्म लेने का पहला नियम है मृत्यु को प्राप्त होना। ‘मृत्यु ‘ एक बहुत ही भयानक सच है ,अच्छों अच्छों के हाथ पैर इसके विचार मात्र से ढीले पड़ जाते हैं और अकाल मृत्यु से पहले ही इहलोक और परलोक दोनों ही डर के मारे हाथ से छूट जाते हैं। मृत्यु से ‘भय ‘ इसे तो प्रत्येक जीव में देखा और पाया जाता है और इस कारण मानव जाति अधिक से अधिक वैभव सम्पदा के पीछे भागती रहती है। उसे पाने के लिए लोग सुकर्म और कुकर्म भी करते रहते हैं पर पवित्र आत्मा जो नित्य और दैविक स्वरुप में शरीर में विद्द्मान है उस पर ध्यान ही नहीं देते। यदि किसी को किसी दिन आत्मा के अमर होने का विश्वास हो जाता है तो यह भी निश्चित जानिए की अमुक व्यक्ति के हृदय से मृत्यु का भय भी समाप्त हो गया है।
Swamy Chimney Nanda says —–: Through Geeta, our poet Seer Vyasa is making Lord Krishna declare that the purpose of life for everyone is the attainment of perfection and to evolve oneself to it, one must make use of every little change in one’s own allotted life.”
“To waste our life complaining against, brooding over and dispairing for the happenings, around us, is to shamelessly lay waste our life .”
जो मनुष्य सुख या दुःख में व्यतिथ नहीं होता और परिस्तिथियों के अनुसार व्यवहार करता है वही ज्ञानी कहलाता है।
ऐसे लोग स्वार्थी नहीं होते ,वे सबके हितों को ध्यान में रख कर निर्णय लेते हैं –ठीक ऐसी परिस्तिथि में अपनी दुविधा के लिए अर्जुन को युद्ध भूमि में विचलित देख कृष्ण ने कहा —–
श्लोक -१६ –अर्थात
“असत वास्तु का (कभी )आस्तित्व नहीं होता और सत् वास्तु का (कभी )आभाव नहीं होता। इन दोनों का ही स्वरूप तत्त्वदर्शियों (अर्थात ज्ञानियों ) के द्वारा देखा गया है।”
जो मिथ्या है वह मिथ्या ही रहेगा उसमें सत्य का कभी कोई आस्तित्व नहीं होगा परन्तु दूसरी ओर ‘सत्य है ‘जिसका कोई आभाव नहीं है अर्थात जो है उसे वैसा ही स्वीकार कर व्यवहार में वर्तना , यह एक सत्य आचरण है। जो पुरुष तत्व ज्ञानी होते हैं वे इस भेद को जान कर व्यवहार करते हैं। इस विषय को ले कर बहुत कुछ कहा सुना और लिखा गया है। कुरुक्षेत्र में खड़े व्यथित अर्जुन
को भी ज्ञान देना अनिवार्य हो गया था इस लिए श्री कृष्ण ने उपरोक्त शब्द अर्जुन से कहे।
सत्य और असत्य ये भी एक वस्तु विचार या भाव आदि के दो स्वरुप हैं। यदि कुछ असत्य कहा या सुना जाये तो इसे हम उचित नहीं कह सकते। जो है या जो हो रहा है असत्य उसके
विपरीत विचार हैं ,अधिकतर अपने सुख या ख़ुशी के लिए विचारों को या सत्यता को तोड़ मरोड़ कर एक अलग ही रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे में बात या स्तिथि मनघडंत है तो उसका कोई स्थाई स्वरुप हो ही नहीं सकता , ऐसी परिस्तिथियों के पैदा होने के कई कारण हो सकते हैं ,पर वो कारण भी असत्य को सत्य के रूप
में प्रस्तुत करने के विफल प्रत्यन मात्र ही कहे जा सकते हैं। अधिकतर ऐसा होता है जब साम दाम दंड भेद द्वारा असत्य को सत्य के रूप में लोगों के विचारों में ,व्यवहार में ,कार्यों में या फिर किसी अन्य रूप में स्थापित कर दिया जाता है ,या करने और करवाने का प्रयत्न भी किया जाता है तो अज्ञानी मनुष्य इस भेद को समझने में असमर्थ होने के कारण उसे वैसा ही स्वीकार कर तदानुसार कार्य भी करने लगते हैं। यह परिस्तिथि किसी व्यक्ति विशेष की नहीं हो सकती प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया
असत्य कभी कभी पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेता है ,और उसके अच्छे या बुरे प्रभावों के प्रभाव से लोग प्रसन्न भी होने लगते हैं। परन्तु असत्य अधिक समय तक टिक सकता और सत्य तो सत्य है ,शाश्वत है इसका प्रभाव क्षणभंगुर नहीं होता अपितु युग युगांतर तक रहता है।
“A false hood can never be validated by another false hood .In delusion the accpted false appearing truth can never be accepted as real . .In normal life the unreal cannot be real in any case .That which exist as its form may also appear as real and the same is the case ,with delusion .” from Madhvachary’s commentry .
असत्य का प्रयोग सिद्धि लिए किया जाता है। इसलिए यह सर्वजन हिताय कभी नहीं हो सकता। दूसरी ओर सत्य कठोर ,कठिन या दुर्गम हो सकता है पर अंतरात्मा पर बोझ कभी नहीं हो सकता , यह कीचड़ में कमल के समान है। बात जरा सा विषय से हट कर है पर ध्यान देने योग्य है। हमारी हिन्दू सस्कृति में पूजा के विधि विधान में कई तरह के प्रतीक हैं -मूर्ति के रूप में ,चित्र के रूप में -जिनकी हम अपनी श्रद्धानुसार या आवश्यकतानुसार पूजा अर्चना करते हैं .इसके लिए व्रत उपवास
कर भेंट आदि भी चढ़ाते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति लिए प्रार्थना भी करते हैं। सभी प्रतीक हमारी भावनाओं एवं आवश्यकता के अनुरूप होते हैं , प्रतीकात्मक होने साथ साथ सत्यता भी दर्शते हैंजो अधिकतर लोग समझ नहीं पाते और स्वार्थ के लिए प्रार्थना करते रहते हैं। हम यहाँ लक्ष्मी देवी की पूजा एवं चित्र का उदाहरण लेते हैं। चित्र में लक्ष्मी जी बहुत सुंदर रूप में आभूषणों से अलंकृत ,मुख पर स्मित हास्य लिए कमल के फूल पर विराजमान हैं। लक्ष्मी जी की चार भुजाएं हैं ,एक हाथ आशीर्वाद के लिए उठा है और दूसरे हाथ में कमल है जो ऊपर की ओर उठा है ,(किसी किसी चित्र में एक हाथ में कलश भी दीखता है ,जल जैसी निर्मल भावना का प्रतीक -शुद्धता का साधन )और दूसरे दोनों हाथों से धन की वर्षा हो रही है। कमल का फूल जो कीचड़ में उगता है, पर रहता सदा कीचड़ से ऊपर है ,उस पर कीचड का कोई प्रभाव नहीं है , वह अति सुन्दर और निर्मल है ,निर्मलता जो सत्य है और जो सत्य है वही कल्याण कारी है और जो कल्याणकारी है वही सूंदर भी है।
हम कितने भी दल दल में क्यों न फंसे हों यदि हम प्रयत्न कर उस दल दल से ऊपर उठ जाते हैं ,उसे पहचान लेते हैं तो निश्चय ही हमारे कर्म कल्याणकारी होंगे और सूंदर होंगे। श्री कृष्ण भी अर्जुन को युद्ध भूमि में अहंकार और लोभ रुपी दल दल में कमल के समान रहने को कहते हैं ,सत्य क्या है पहचान लेने को कहते हैं।
लक्ष्मी जी के जिन हाथों से धन की वर्षा हो रही है वो धरती की ओर इंगित करते हैं। हमें चित्रकार की ऐसी रचना पर पल भर को विचार करना चाहिए की लक्ष्मी माता ने धन की वर्षा किसी भक्त पर क्यों नहीं की ,सारा धन धूलधूसरित क्यों किया जा रहा है। धन सम्पदा अहंकार और लोभ को जन्म देती ,धर्म की अवहेलना करती है इस लिए उसे पाने के लिए अन्याय और अधर्म का सहारा नहीं लेना चाहिए ,ये सब तो एक दिन मिट्ट में ही मिल जाने वाला है। सदा हाथों में नहीं रह सकता। स्पष्ट है की हमें ज्ञान का सूरज उग जाने पर कमल की भांति खिल जाना है और माया रुपी दल दल से ऊपर उठना है ,और जल समान अपने ज्ञान को निर्मल बनाना है न की धन के सामान जो एक न एक दिन इस धरती में ही विलय हो जाने वाला है।