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जिन्दगी : “जीवन यात्रा “

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      Neera Bhasin श्री कृष्ण बार बार एक ही बात अर्जुन को समझा रहे हैं की ‘सच ‘न तो बदला जा सकता है और न ही उसे झुठला सकते हैं। 
आत्मा एक शरीर से दूसरे में फिर तीसरे में समयानुसार और परिस्तिथियों के अनुसार स्थानांतरित होती रहती है –तो फिर हम क्यों मोह माया के जाल में फंस कर भ्रमित हो जाते हैं। इसका एक भौतिक पहलु भी है जिसे आदि शंकराचार्य जी ने अपना मत देते हुए लिखा है “हम यहाँ अर्जुन को उसकी अज्ञानता ,उसकी विवशता और जिज्ञासा को देख उसे दोषी नहीं मान सकते” क्योंकि उपरोक्त परिस्तिथियों को तो हम मानवोचित गुण  की संज्ञा देते हैं। यह हमारे सामाजिक व्यवहार का एक हिस्सा है। अर्जुन भी एक राजकुमार होने के साथ साथ अपने परिवार और समाज का भी एक सदस्य था। 
              “The self just spoken of is very difficult to realize. Why should I blame you alone while the cause, ignorance is common to all: how is it that the self is so difficult to realize?
                                Adi Shankaracharya 
                “Perhaps it is to avoid such problems that we do not know what happens after death. We only know what is between birth and death. yet –it emerges from the darkness,yet, and passes through a lighted area -vyakt ,and disappears into the darkness again -avykta . It is not known before it is not known later .”
                                Swami Dyanand Sraswati 
    साधारण मनुष्य का ज्ञान तो वहीँ तक सीमित है जो उसने अपने जीवन काल में अपने अच्छे बुरे कर्मों के साथ जीया ,कहाँ उसे सुख मिला कहाँ वह बंधनों के कारण हंसा रोया और अवसरानुसार जिया। पर सत्य इस आलोकित जीवनचर्या से परे है। वो वहां है जहाँ से उसका उद्गम हुआ और अपनी अवधि समाप्त कर वहीँ जा विलय हो गया। एक फिल्म के गीतकार ने अपनी एक रचना में लिखा है “संसार की हर शह का बस इतना फ़साना है ,इक धुन्द से आना है –इक धुन्द में जाना है। 
      जब बात इतनी गहराई की हो तो कभी कभी ‘आत्मा ‘एक चमत्कार ही लगती है ,पर किसका दिखाया चमत्कार ,किसका बताया चमत्कार। सच है ,शास्वत है ,किसी के होने न होने का आधार है तो हमारे चारों तरफ इतने भ्रम क्यों बढ़ते जा रहे हैं। क्या जो हमारे सामने है ,प्रत्यक्ष रूप में है उसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना चाहिए या फिर तर्क बुद्धि से अच्छे बुरे का भेद जान लेना चाहिए या फिर आत्मा के सच को मान लेने में ही 
भलाई है। यदि हम और आप इन प्रश्नों में उलझ सकते हैं तो 
अर्जुन का विलाप और दुविधा व्यर्थ कैसे हो सकती है। हाँ यह कह कर की यदि यह सब बाधाएं मनोचित भौतिकता की देन हैं 
तो फिर ‘आत्मा ‘ जैसा पवित्र बल हमें सचेत और सजग क्यों कर नहीं करता।  कभी कभी आश्चर्य होता है की सच  को खोजना और समझना पड़ता है और बुरे कर्म और बुरे विचार ,बंधन आदि आप ही आप मन बुद्धि और कर्म पर अपना अधिकार जमा लेते हैं। क्यों ? क्या यह मात्र भ्रम है ?यदि सुविचारों का आधार ज्ञान है तो अच्छे और बुरे का विचार कर ,अध्ययन कर ,उसके या उससे 
होने वाले लाभ हानि का फल -कुफल सोच कर ही अच्छे और बुरे कर्मों को निर्धारित किया गया होगा। लोग इसे स्वीकार करें या अस्वीकार -पर जो हानिकारक है वो सुखकर तो नहीं हो सकता 
और  यदि वो सुखकर और लाभकारी नहीं है तो ‘विचार ‘ इससे इतना प्रभावित क्यों होते हैं ,कर्म अनुचित राह क्यों चुन लेते हैं। 
भौतिक सुखों की खोज ,भाग दौड़ उचित अनुचित राह पर चल कर उन्हें समेटना —क्या इस राह में कभी कभी ज्ञान का दीपक 
अपने आप ही प्रज्वल्लित नहीं हो सकता ,क्यों इस नींद से जागने के लिए ठोकर खाना आवश्यक होता है। सुकर्मों की अपेक्षा बुरे कर्म या सोच क्यों मन पर हावी हो जाते हैं। कभी कभी ऐसा  लगता है की हम सभी भटक रहे हैं ,बुराई का दामन छूटता  नहीं है और आत्माकी खोज में चल पड़ते हैं। हो सकता है ऐसे कई राही आपस में टकरा जाते हों -मन में हो सकता है सदविचारों की गंगा बह रही हो ,पर लगता है वो मिल कर भी नहीं मिल पाते। शायद एक दूसरे को पहचान नहीं पाते या फिर अहंकार आड़े आ जाता है ?पता नहीं —-दुर्योधन पर महत्वकाक्षाएं हावी हो गई या अहंकार। एक बार इस बात को दूसरे ढंग से सोचते हैं —तो ‘पिता ‘धृतराष्ट्र बहुत अधिक महत्वकांक्षी था ,संतान का मोह और अपने अधूरेपन का क्षोभ उसे और अधिक अधीर करता रहता था  ,जिस सुख की प्राप्ति को भौतिक  जीवन में नेत्रों  द्वारा अनुभव  किया जा सकता था ,उससे धृतराष्ट्र जन्म से वंचित था ,दूसरी ओर वह योद्धा सैनानी 
और राजकुल से भी था। पर उसके तन की वीरता उसके मन की अधीरता को थाम न सकी ,आहट  से आने वाले व्यक्ति को पहचान लेने की क्षमता और परिस्तिथियों को भांप लेना की क्षमता रखने वाले धृतराष्ट्र  अपने ही पुत्रों की उदंडता को समझने में कैसे असमर्थ रहे। कारण वश या फिर परिस्तिथियोंवश या फिर भाई पांडू के प्रतिनिधित्व के वश – वे हस्तिनापुर पर शासन करते रहे।  उनमें ना कुशलता की कमी थी न बुद्धि की और न  ही दरबार में वयोवृद्ध नीतिपरख परिजनों एवं मार्गदर्शक 
गुरुओं की कमी थी ,फिर भी देश में धर्म का विनाश होता चला गया और अंत में समस्त भारत भूखंड के राजपरिवार कुरुक्षेत्र के मैदान में दो पक्षों में विभाजित हो युद्ध के लिए आ खड़े हुए। बार बार एक ही प्रश्न मन में उठता है : क्या ‘धर्म ‘ इतना रसातल में चला गया की मात्र एक अर्जुन के हृदय में  ही अनुराग जागा .इतिहास का यह युग बहुत ही अंधकारपूर्ण लगता है महाभारत की कही सुनी कथाओं में फेर बदल हो जाना संभव है पर ‘युद्ध ‘ का होना यह एक कोरी कल्पना तो नहीं कही जा सकती। इसे भी किसी ‘सत्य ‘ का प्रमाण ही माना जायेगा। अब हो सकता है ऐसी कठिन घड़ी में अर्जुन का मन शिथिल पड़  गया हो और युद्ध भूमि में सज्ज भारी मात्रा में खड़े सैनिकों को देख अर्जुन क्या कोई भी ज्ञानी पुरुष यह समझ सकता है की अब मानव जाति का अंत होने में अब देर नहीं।  
                  श्री कृष्ण को भी यह आभास था इसलिए उनहोंने अर्जुन का ध्यान अपनी ओर खींचा और कहा की जीवन क्षणभंगुर है। यह अभी है और अभी नहीं जैसे गहरे अंधकार में 
जगमगाते जुगनू। जीवन प्रवाह ऐसे ही चलता है और ऐसे ही लोप हो जाता है ,जैसे कभी था ही नहीं। शरीर का एक निर्धारित नियम है। एक शरीर का त्याग कर आत्मा अपने निर्धारित समय पर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है -यह ही विधि का विधान है इसलिए यह सरलता से समझा जा सकता है की जन्म मृत्यु की ओर पहला कदम है। यह नियम बद्ध है ,क्रम बद्ध है और काल बद्ध भी है जो जन्म लेता है या फिर मरता है या कहें शेष रह जाता है वह शरीर है –वो जिसमें आत्मा वास करती थी। सांसारिक भाषा में कहें तो शरीर के कई संबंधी और व्यवहार होते हैं और उसे किसी ‘नाम ‘विशेष से सम्बोधित भी करते हैं 
पर आत्मा के शरीर से अलग होते ही वह मात्र शरीर है –और कुछ नहीं। 
                       श्री कृष्ण ने इस श्लोक में इसी ‘सत्य’ को अर्जुन से कहा -की किसी की आत्मा के शरीर त्याग करने पर शोक करने की आवश्यकता नहीं। जो स्थाई नहीं है उसका तो अंत निश्चित है और जो है ही अस्थाई उसके लिए दुःख क्योंकर .इसी ज्ञान के कारण गीता के उपरोक्त श्लोक को बहुत महत्व दिया जाता है। 
 
नीरा भसीन