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जिन्दगी : “मानसिक पीड़ा “

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          Neera Bhasin     श्लोक २५  अध्याय  २ 
   भावार्थ –कहा जाता है की यह (आत्मा) प्रगट नहीं किया जा सकता है ,इसका विचार नहीं किया जा सकता है और यह विकार को प्राप्त नहीं होता है। अतः इस (आत्मा) को इस प्रकार जान कर तुझे शोक करना उचित नहीं है। 
                    श्री कृष्ण ने अपनी बात को स्थापित करते हुए कहा की अधिक सोच विचार करना का यह समय नहीं है। ‘मृत्य ‘आत्मा का अंतिम पड़ाव नहीं है। इसलिए हे अर्जुन तुम्हारा शोकाकुल हो जाना उचित  नहीं है आत्मा कोई अनुभूति नहीं है और न ही कोई वस्तु विशेष जिसके होने न होने या फिर विचारों को प्रभावित कर किसी तरह से मनुष्य को प्रभावित करने में उसका कोई योगदान है। हम उसी को व्यक्त कर सकते हैं जो किसी वस्तु विशेष के रूप में हो ,जिसका आधार हो ,आकर हो ,रूप हो ,रंग हो ,ठोस पदार्थ हो या फिर तरल पदार्थ -पर आत्मा के संबंध में ऐसा कुछ है नहीं। ‘आत्मा ‘तो नित्य है ‘आत्मा ‘है तो  जीवन है। हम सत्य में कोई फेर बदल नहीं कर सकते क्योंकि इसका तो कोई आकर ही नहीं है। हम तरह तरह के खाद्य पदार्थों ,भौतिक वस्तुओं आदि को अपनी इच्छा के अनुसार ,स्वादानुसार ,विचारानुसार आवश्यकता अनुसार उनमें फेर – बदल कर सकते हैं और अपने लाभ व रूचि के लिए उन्हें उपयोग में लाते हैं। दूध से दही मिठाई,आदि बहुत कुछ स्वादिष्ट आहार बना सकते हैं पर ‘आत्मा’के बारे में ऐसा नहीं है ,यह तो दुःख सुख और स्वाद से परे है हम इस बात को तो प्रमाणित भी नहीं कर सकते की अमुक समय पर आत्मा प्रस्सन्न थी और अमुक समय पर दुखी थी क्योंकि इन भावनाओं का आधार तो विचार हैं ,परिस्तिथियाँ हैं ,भौतिक उपलब्धियाँ एवं भौतिक हानियाँ है जो विचारों को प्रभावित करती हैं और तदानुसार हम दुखी या प्रसन्न होते हैं। लेकिन ‘आत्मा ‘इन सब से परे है। इसलिए हे अर्जुन तुम्हारा इस तरह से शोकाकुल हो जाना सर्वथा व्यर्थ है ,क्योंकि यदि हम 
किसी के जीवित होने या उसके मृत्यु को प्राप्त होने से शोकाकुल हैं  तो यह अज्ञान है ,व्यर्थ है क्न्योकि देह को धारण करने वाला जीव अर्थात ‘आत्मा ‘तो अमर है। जो नित्य है वह ‘आत्मा ‘ है औरजो हम जानते हैं की यह एक न एक दिन नष्ट होने वाला है 
वह शरीर है। फिर इस सच पर शोक कैसा। कुरुक्षेत्र में उपस्तिथ 
सभी प्रियजन और वयोवृद्ध पूजनीय परिजन ,पक्ष और विपक्ष में उपस्तिथ लोग ,विनाश की नियति और समय की परिधि में बंधे 
हुए हैं –तो फिर शोक कैसा। 
   श्लोक २६ –अध्याय २ 
भावार्थ —–और यदि तू इस (आत्मा ) को जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानें ,तो भी हे महाबाहो (अर्थात हे वीर पुरुष ) तुझे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए। 
                     पल भर को अर्जुन की बात का समर्थन करते हुए 
कृष्ण ने अर्जुन को वीर कह कर सम्बोधित किया (जो वीर होते हैं 
वो मात्र शरीर से ही नहीं विचारों से भी वीर  होते हैं ,उन्हें अपने कर्त्तव्य  पालन का प्रतिपल धयान रहता है क्योंकि वे उचित और अनुचित का भेद समझते हैं ,जिन्हें अपनी भुजाओं के साथ साथ अपनी बौद्धिक शक्ति का भी ज्ञान होता है। वीर पुरुष शस्त्र चलने की विद्या मात्र पा लेने से नहीं बन सकते ,अपितु उनको  अपनी शारीरिक शक्ति का प्रयोग करने से पहले परिस्तिथियों का विवेकपूर्ण विश्लेषण करना भी अनिवार्य होता है ,तभी युद्ध का मैदान हो या जीवन का संघर्ष —वह विजय प्राप्त कर सकता है। अर्जुन विवेकी और शक्तिशाली था ,इस लिए श्री कृष्ण उसे  ‘वीर’ कह कर संम्बोधित करते हैं। हे अर्जुन तुम इस शरीर में स्तिथ आत्मा को देखो ,मात्र शरीर या शरीर से जुड़े पारिवारिक या सामाजिक संबंधो को नहीं। जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है पर यहाँ श्री कृष्ण इस बात पर जोर दे कर कहते हैं 
की जब आत्मा का कभी नाश नहीं होता तो फिर शोक किस बात का।  युद्ध में उपस्तिथ -युद्ध के लिए तत्पर सभी योद्धा इनका 
इस समय यहाँ युद्ध के लिए तत्पर होना या फिर ऐसा कहें की 
इनका जीवात्मा को  धारण करना अर्थात जन्म लेना इस बात को सिद्ध करता है की ये मृत्यु को प्राप्त होंगे -इसी युद्ध भूमि में ,तो फिर शोक कैसा।
    श्लोक २७  ,अध्याय २ 
    भावार्थ —जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का पुनर्जन्म निश्चित है। इसलिए ऐसे अनिवार्य विषय में तुझे शोक नहीं करना चाहिए। 
                    मनुष्य का यह स्वभाव है  वह सदा मानसिक समस्याओं से घिरा रहता है और यह उसकी अविवेकपूर्ण सोच का और धारणाओं का परिणाम है और फलस्वरूप वह सदा अशांत एवं तनावग्रस्त रहता है ,कभी कभी प्रत्यक्ष परिस्तिथियों की भी अवहेलना कर शोक और शिथिलता के अन्धकार में डूबता चला जाता है युद्ध के मैदान में -युद्ध का उद्देश्य ,कर्तव्य ,समाज का अधर्म के कारण हो रहा पतन –सब कुछ अर्जुन के मन से लोप हो गया और जो दिख रहा था वो शत्रु पक्ष में युद्ध के लिए उद्धत गुरुजन और बंधू बांधव ,यह देख पल भर में अर्जुन का  सारा विवेक हवा हो गया और मोह ने आ घेरा। मोह का अन्धकार इतना गहरा गया की कुछ और दिखाई देना बंद हो गया। ऐसी परिस्तिथि में दुखी व्यक्ति के सामने ‘सत्य ‘को प्रस्तुत करना आवश्यक था। कई बार ऐसा होता है की जब कोई मनुष्य अर्जुन जैसी परिस्तिथि में आ जाता है तो उसे श्री कृष्ण जैसे 
मार्ग दर्शक की आवश्यकता होती है। यह बात हम यहाँ स्पष्ट रूप से देख पा रहे हैं। उसी बात को श्री कृष्ण ने फिर से दोहराते हुए कहा ‘आत्मा ‘ को धारण कर शरीर जो जन्म लेता है वह शरीर मात्र एक भौतिक स्वरुप है जो अजर अमर नहीं है। जीवन और मरण यह एक धारा प्रवाह की तरह है और निरंतर है जिस पर न तो हम कोई प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं और न ही कोई तर्क कर सकते हैं। जो है उससे ऊपर उठ कर सोचना होगा। हम जानते हैं की तेल गर्म है और फिर भी हम उसमे अपना हाथ  डाल दें और कहें की तेल गर्म था हाथ जल गया -यह तर्क का विषय नहीं है यह अज्ञानता है। यदि शब्दों को कर्कश न समझा जाये तो कह सकते हैं की “यह मूर्खता है “.जब मृत्यु अवश्यम्भावी है तो इससे व्यतिथ हो जाना भी जान कर भी अनजान बनाने वाली बात है। कृष्ण का तो पूरा जीवन ही एक प्रेम सन्देश है। “सदा प्रसन्न रहो “यह उनका उपदेश है। और सदा प्रसन्न वही रह सकता है जिसे प्रस्तुत परिस्तिथियों का पूरा ज्ञान  होता है। अज्ञानता ‘ मोह और अहंकार ‘को जन्म देती है और ज्ञान ‘सत चित आनंद ‘ को।  
 
नीरा भसीन