Home विविधा जिन्दगी :” सत्य है या असत्य “

जिन्दगी :” सत्य है या असत्य “

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Neera Bhasin
दुर्योधन को अहंकार और लोभ ने युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया था और उसकी लालसा के  चलते अधर्म चारों ओर फ़ैल रहा था। श्री कृष्ण ने कहा की ज्ञानी वही है जो लोभ के पीछे छिपे  सत्य को पहचान सके। जिसमें प्रत्येक दृष्टिकोण को समझ  लेने की क्षमता है वही  तत्व ज्ञानी है। फिर कभी ऐसा भी हो सकता है जो हमें प्रत्यक्ष दिखाई देता है उसका स्तव  या तत्व वैसा न हो कर कुछ और हो। अर्जुन के समक्ष युद्ध भूमि में जो वीर योद्धा युद्ध करने के लिए प्रस्तुत थे -यह भी तो हो सकता है की वे सब के सब उसके शत्रु न हों और किसी कारण वश अर्थात कर्तव्य वश ,वचन बद्ध  या फिर अधरम के नाश के लिए युद्ध ही एक मात्र विकल्प मान वहां उपस्तिथ हों। ये सभी विषय गंभीर हैं और जो प्रत्यक्ष दिख रहा था वैसे नहीं है -पर अर्जुन को जो समक्ष दिखा वह देख उसका मन विचलित हो गया –ऐसे में जब मन विचलित हो तो परिस्तिथियों की गहराई तक जा कर सत्य की गहराई को समझ पाना कठिन लगता है। प्लूटो एक महान दार्शनिक हुए हैं उन्हों ने अपने विचारों को The theo of knowledge में कुछ इस तरह लिखा है —
                       The theory of ‘Ideas’ is itself based upon the theory of knowledge. What is knowledge? What is the truth? Plato opens the discussion by telling us first what knowledge and truth are not. His object here is the refutation (something is false)of false theories. These must be disposed of to clear the ground preparatory (to prepare ) to positive exposition. The first such false theory which he attacks is that knowledge is perception.
                          (कुरुक्षेत्र और विराट सेना ,यद्ध का शंख नाद -यह सब महाकाल का आवाहन ही प्रतीत होता है –अर्जुन को भी यहाँ मृत्यु ही दिखाई पड़ी )
                       The knowledge is a perception is a theory of Protagoras and the Sophists, and we have seen what results in its leads. What it amounts to is that what appears to each individual true is true for that individual. But this is not at any rate, is false in its application to our judgment of future events. The frequent mistakes which we make for our future show this. It may appear to me that I shall be chief justice next year, but instead of that, I find myself in prison. In general, what appears to each individual to be the truth about the future frequently does not turn out so in the event.
  It is founded upon the view that truth means the correspondence of one’s idea with the facts of existence. If I see a lake of water, and if there is really such a lake,then my idea is true.But if there is no lake, my idea is false. It is a hallucination . The truth according to this view, means that the thought in my mind is a copy of something outside my mind. Falsehood consists of having an idea which is not a copy of anything which really exists.Knowledge, of course, means knowledge of the truth. Plato.
                                मन में विचार मात्र कर लेने से हम सच और झूठ को निर्धारित नहीं कर सकते ,उसके लिए सत्य और असत्य का भेद करना आवश्यक है। एक बात तो यहाँ स्पष्ट हो जाती है की कहीं न कहीं हमारे अन्तर्स्थल में वह दैविक अंश है जो सत्य है और सिर्फ सत्य है ,जो जन्म और मृत्यु से परे है और उचित मार्ग प्रदर्शन करने से कभी नहीं चूकता ,हाँ यह बात दूसरी है की हम उसे सुन कर भी अनसुना कर देते हैं। क्योंकि झूठ किसी कारणवश बोला   जाता है जो सच पर पड़े एक परदे के समान है और यदि ऐसा है तो एक बात स्पष्ट हो जाती है की झूठ का अपना कोई निजी आस्तित्व है ही नहीं -पर तत्व ज्ञानी इसके दोनों रूप पहचान लेते हैं।