Home महिला जगत उम्मीदें बिखरी हैं मेरी… प्राची मुकेश सिंह

उम्मीदें बिखरी हैं मेरी… प्राची मुकेश सिंह

517
0
SHARE
कोविड महामारी में बीमार होने पर यदि सकारात्मक ऊर्जा से अपने भीतर अच्छे विचारों का आदान प्रदान करें तो दवा के साथ साथ तनाव मुक्तता जल्दी ठीक होने में सहायक होगी. कुछ इसी तरह का सन्देश दे रहीं है हल्द्वानी उत्तराखंड में रहने वाली कवयित्री, लेखिका,पर्यावरणविद प्राची मुकेश सिंह..
हल्द्वानी, कुमायूं के विभिन्न नामी गिरामी शिक्षण संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर रह चुकी प्राची सिंह ने एक सकारात्मक सन्देश देती कविता को अपने सोशल मीडिया मंच पर लिखकर ओरों को सन्देश देने का प्रयास किया है.
कवयित्री, लेखिका प्राची मुकेश सिंह राजस्थान के प्रख्यात बनस्थली विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट हैं.
प्रस्तुत है पर्यावरणविद, कवयित्री, लेखिका प्राची मुकेश सिंह की कोविड संघर्ष के दौरान लिखी पंक्तियाँ….
फेसबुक से साभार

देखो

वहीं कहीं कमरे में

उम्मीदें बिखरी हैं मेरी…

मेरा कोमल सा नन्हा सा सपना होगा

प्रेम पत्र में मैंने जो लिख डाला होगा…

वहीं फाड़ कर कचरे के पन्नों सा तुमने

तुरुढ़ मुरुढ़ कर डस्ट बीन में डाला होगा…

एहसासों की पूँजी में लिपटे शब्दों को

शायद तुमने इक दिन आग लगा दी होगी,

उस दिन से मेरी पलकों में सिर्फ धुआँ है

देखो

वहीं कहीं कमरे में

आँखें भरी भरी हैं मेरी…

कुछ सवाल जो मैने जब तब पूछे तुमसे

इंतजार में अब तक गुमसुम वहीं कहीं हैं,

रहे अनसुने शापित उत्तर बिना तिरस्कृत

अट्टहास भर मत कह देना “कहीं नहीं हैं”,

ज़रा टटोलो तुम अटकी साँकल के तल में,

चादर की सिलवट में बंधी किसी हलचल में,

सच्ची झूठी आस लगाए जाने कबसे

देखो

वहीं कहीं कमरे में

नम सांसें ठहरी हैं मेरी…

दरवाज़े के बाहर से ही ठिठकी ठिठकी

इक दस्तक बिन दस्तक के मुड़ जाती होगी,

रुंधता होगा कण्ठ, सिसकती होगी बोली

कितनी मुश्किल से आवाज़ लगाती होगी,

जमे जमे मेरे उन शब्दों को चुन चुन कर

वहीं कहीं आँगन में चिड़िया गाती होगी,

देखो खिड़की खोल, झरोखे खोल पुकारो

देखो

वहीं कहीं कमरे में

शायद स्वर लहरी हैं मेरी…

एक सुबह की खुशबू वाला भीना झौंका

चुपके से मेरे आलिंगन से बहता है,

बेसुध सा मनचला मुझे ख्वाबों में छल कर

जब जाना हो आर पार जा कर रहता है,

आता होगा तुमको छूने अक्सर गुपचुप

तुमसे ही बतियाता होगा अक्सर लुकछुप,

ज़रा टटोलो केवल दो पल पलक मूंद कर

देखो

वहीं कहीं कमरे में

हर ख्वाहिश संवरी हैं मेरी…

~प्राची