श्लोक संख्या 64 , अध्याय -2 भावार्थ -- परन्तु आसक्ति और द्वेष से रहित अपने वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों...
Read moreश्लोक -61 ,अध्याय - 2 भावार्थ --इस लिए ( साधक ) उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहितचित्त तथा मेरे परायण होकर स्तिथ रहे।...
Read moreश्लोक 59 --अध्याय 2 भावार्थ --- निराहारी ( अर्थात इन्द्रियों द्वारा विषयों का ग्रहण न करने वाले )पुरुषों के...
Read moreश्लोक -56 , अध्याय -2 भावार्थ --दुखों में जिसका मन उद्ग्विन नहीं होता ,सुखों में जो स्पृहारहित है तथा जिसके राग...
Read moreश्लोक 54 --अध्याय 2 भावार्थ --अर्जुन ने कहा ---"हे केशव समाधि में स्थित स्थितप्रज्ञ (अर्थात स्थिर बुद्धि वाले...
Read moreश्लोक 52 --अध्याय 2 भावार्थ -जब तेरी बुद्धि मोहरूपी पंक को पार कर जाएगी उस समय...
Read moreश्लोक 50 --भावार्थ , ( समत्व ) बुद्धि से युक्त...
Read moreश्लोक 48 --अध्याय 2 भावार्थ --हे धनंजय ! तू योग में रहते हुए आसक्ति का त्याग करके तथा सिद्धि और असिद्धि में सम हो कर कर्मों को...
Read moreयदि हम हिन्दू धर्म के मर्म का गहराई से अध्यन करेंगे तो समझ सकेंगे की कोई कर्म या...
Read moreजीवन दो विपरीत भावों के आधार पर चलता है -दोनों भाव समांतर तो हो सकते हैं पर साथ साथ मिल कर...
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